प्रेषक : वी गुप्ता
मैं गुप्ता बहुत समय से कहानियाँ पढ़ रहा हूँ। कई बार सोचा कि अपने जीवन की घटनाओं के बारे में लिखूँ। पर पता नहीं हिम्मत नहीं हो रही थी। आज जब एक बार फिर से मैं साईट पर गया तो फ़ैसला किया कि एक बार तो अपना अनुभव मैं भी लिखूँ।
मैं आज चालीस साल का हूँ पर सेक्स का खुमार तो अभी भी बहुत है। एक तो वैसे ही मेरा जॉब घूमने वाला है और मैं भारत में घूमता रहता हूँ और हफ्ते में केवल दो तीन दिन के लिए ही घर जा पाता हूँ इसलिए जब घर जाता हूँ तो मेरी बीबी तो थक ही जाती है।
अब मैं अपनी पहली चुदाई के बारे में बताता हूँ।
उस समय मैं 18 साल का था, मेरी दूर की नज़र थोड़ी कमजोर थी। उस समय दिल्ली में एक डॉक्टर आया जो इलाज से चश्मा उतरवा देता था। बस मैं भी उसके पास पहुच गया। वहाँ पर एक हफ्ते तक रहना था। मेरे साथ वाले पलंग पर एक छोटी लड़की भी इलाज़ करवा रही थी। मेरे चश्मे का नंबर तो केवल -1 था पर उसका नंबर उस समय -3.5 था। उसके साथ उसकी मम्मी रहती थी।
यह दूसरी रात की बात है, जब सब सो रहे थे कि अचानक मुझे अपने पैर पर किसी का हाथ महसूस हुआ। मैंने धीरे से आँख खोल कर देखा तो पता चला कि लड़की की माँ जो मेरे पैरों की तरफ मुँह करके सो रही थी वो मेरे पैरों को सहला रही थी।
मैं कुछ नहीं बोला, चुपचाप सोने का बहाना करता रहा। हम दोनों के पलंग में केवल ६" का फासला था। थोड़ी देर में उसने मेरा पैर पकड़ कर अपने पास खींच लिया और अपने सीने पर दबा दबा कर रगड़ने लगी। अब मेरा लंड भी खड़ा हो गया लेकिन मैं फिर भी आराम से लेटा रहा क्योंकि यह मेरा पहला मौका था इसलिए मेरी गांड फट रही थी।
पर थोड़ी देर बाद मैंने हिम्मत करके अपने पैर के अंगूठे से उसके मोमों को रगड़ना शुरु कर दिया। इतने में अचानक उसने अपना ब्लाऊज़ ऊपर करके अपने मोमे बाहर निकाल लिए। उसने ब्रा भी नहीं पहनी थी। इस अचानक हुए परिवर्तन ने मेरी हवा निकाल दी। मुझे डर लग रहा था कि अगर कोई आ गया या कोई उठ गया तो क्या होगा !
पर वो आराम से मेरे पैर से अपने मम्मे मलवा रही थी।
धीरे धीरे मेरे हिम्मत भी बढ़ गई और मैं थोड़ा नीचे को सरक गया और पूरा जोर लगा कर अपने पैरों से उसके स्तन मलने लगा। उसने धीरे से अपना हाथ आगे करके मेरे लंड को पकड़ लिया और जोर से मलने लगी। मेरी तो जैसे जान ही निकल गई। फिर मैंने अपनी साइड बदल कर उसकी तरफ मुँह कर लिया और उसके मोमे जोर जोर से दबाने लगा। उसके मोमे बहुत ही नर्म-मुलायम थे। फिर धीरे से मैंने आगे को झुक कर उसके चुचूक को मुँह में ले लिया और जोर से चूसने लगा। मैंने इतनी जोर से चूसा कि उसकी आह निकल गई। मैंने पहली बार किसी के मोमे चूसे थे इसलिए मैं तो पागल हुआ जा रहा था।
फिर मेरी हिम्मत और बढ़ गई और मैं चूसने के साथ साथ उसके मोम्मों को कस कस कर दबाने लगा।
वो बोलने लगी- और दबा जोर जोर से !
दस मिनट तक हम ऐसे ही मजे लेते रहे। वो मेरा लंड दबा रही थी और मैं उसके मोमे चूस रहा था और दबा रहा था। लेकिन जगह कम होने की वजह से हम और कुछ नहीं कर सकते थे। फिर मैंने उसकी साड़ी ऊपर करके उसकी चूत में उंगली डाल दी और जोर जोर से अन्दर बाहर करने लगा और वो मस्ती में मेरे लंड को रगड़ने लगी। कुछ देर बाद हम दोनों का माल निकल गया।
कुछ देर तो हम दोनों आराम से लेटे रहे, फिर वो बोली- मजा आया ?
मैंने कहा- बहुत मजा आया !
तो वो बोली- कभी किसी को चोदा है ?
मैंने कहा- नहीं !
तो वो बोली- कभी मेरे घर आना, तो बहुत मजे दूँगी और तुम्हें चोदना भी सिखा दूँगी।
अगले दिन जब मैं, वो उसकी बेटी सब एक साथ बैठे थे, तो उसने सेब निकाले और सब को काट कर खिलाने लगी। बाद में जब सब अपने पलंग पर चले गये तो मैंने उससे कहा- ये क्या छोटे छोटे सेब खिला रही हो !
तो वो बोली- अगर बड़े सेब खाने हैं तो घर आना पड़ेगा ! फिर तुम्हें असली मुलायम और बड़े सेब खिलाउंगी।
मैंने कहा- फिर तो पक्का तुम्हारे घर आना ही पड़ेगा।
उसने अपना पता और फोन नम्बर मुझे दे दिया। फिर कुछ दिनों के बाद हम अस्पताल से अपने अपने घर चले गये।
एक दिन मैने सोचा कि चलो देखे कि वो कितना सच बोल रही थी और मैने उसे फोन किया तो उसने मुझे अपने घर पर आने के लिये बोला।
वो बोली- सुबह 11 बजे मेरे पति काम पर चले जाते हैं, फिर घर पर अकेली हूंगी।
अगले दिन मै ठीक 11 बजे उसके घर पर पहुँच गया। मैने उसके घर की घन्टी बजाई तो उसने ही दरवाजा खोला। उस समय उसने गाउन पहाना हुआ था। मुझे देखते ही वो बहुत खुश हुई और जोर से बोली- वेलकम।
मेरी तो गान्ड फट रही थी, क्योंकि यह मेरी पहली बार थी। खैर मैं उसके घर के अन्दर चला गया। जैसे ही मैं अन्दर गया उसने दरवाजा बन्द कर दिया।क्योंकि मै डर रहा था इसलिये पहले मैंने पूरे घर का एक चक्कर लगाया यह कह कर कि पहले तुम्हारा घर तो देख लूँ। फिर जैसे ही मैं उसके बेडरूम में पहुँचा, उसने कहा- देख लिया ! घर पर कोई नहीं है।
मैं कुछ नहीं बोला, बस उसकी तरफ देख कर मुस्करा दिया। तो वो हंसने लगी और मुझे पकड़ कर एक जोरदार पप्पी कर दी।
बस फिर क्या था, मैंने भी उसे कस कर पकड़ लिया और चूमने लगा। उसने एक दम से मुझे पलंग पर गिरा दिया, मेरे ऊपर लेट गई और कहने लगी- तुझे बड़े बड़े सेब खाने थे ना ? ले आज जी भर कर खा ले !
और उसने अपना गाउन नीचे को करके अपना एक मोमा मेरे मुँह में दे दिया जिसे मैं कस कर चूसने लगा। वो जोर जोर से आह आह करने लगी। उसकी आह सुन कर मेरा लन्ड जोर जोर से फड़कने लगा। मैंने एकदम से पल्टी ली और उसको नीचे दबा लिया और एक हाथ से उसके एक मोमे को कस कर दबाने लगा और दूसरे को चूसते हुए नीचे कपड़ों के ऊपर से ही लन्ड को उसकी चूत पर रगड़ने लगा।
वो भी एकदम गरम हो गई और उसने मेरे सारे कपड़े एक मिनट में उतार दिये और अपना गाउन भी उतार दिया। जैसे ही उसने अपना गाउन उतारा, मेरी तो हालत ही खराब हो गई क्योंकि मैं पहली बार किसी औरत को एकदम नंगा देख रहा था। मेरा लन्ड फटने को तैयार था। इतने में ही उसने मेरे लन्ड को पकड़ कर दबा दिया। मेरी हालत बिल्कुल पागलों वाली हो रही थी।
उसने मुझे पलंग पर गिरा दिया और एकदम से मेरे लन्ड पर बैठ गई और पूरा का पूरा लन्ड अन्दर ले लिया।
लन्ड अन्दर जाते ही क्या सकून मिला ……….…
बता पाना बहुत मुशकिल है ! पहली बार मेरा लन्ड किसी चूत मे गया था।
मैं तो बस स्वर्ग में पहुँच गया था और मेरे साथ साथ उसे भी शायद मजा आया। मैं नहीं जानता था कि ऐसा मजा भी होता है ! मैं तो बस उड़ रहा था और यह शायद उसे भी समझ आ रहा था इसलिये वो बस आराम से बैठी थी।
फिर एक मिनट के बाद वो बोली- क्या हुआ रा…………जा? यह तो बस शुरुआत है !
अब तक मैं भी अपने होश में वापस आ चुका था। मैंने कहा- चिन्ता मत करो और शुरु हो जाओ।
बस फिर क्या था, उसने ऊपर से धक्के लगाने शुरु कर दिये। मैं तो बस मजे से लेटे लेटे मजे ले रहा था, कि वो एकदम से बैठ गई और अपनी चूत को मेरे लन्ड पर कस लिया।
मैंने पूछा- क्या हुआ ?
तो वो बोली- मैं तो गई !
इस पर मैंने कहा- अभी तो शुरुआत है !
तो वो हंसने लगी और बोली- अब तू धक्के लगा !
फिर क्या था, मैंने पल्टी लगाई और उसको नीचे दबा लिया। अब तक मैं भी समझ चुका था कि चुदाई कैसे होती है।
बस सबसे पहले तो उसके मोटे मोटे मोमों को दबाने लगा फिर एक एक को मुँह में ले कर बारी बारी से चूसने लगा। वो भी फिर से मस्ती में आने लगी और कहने लगी- बहुत मजा आ रहा है और जोर से चूस…… काट कर खा जा बस !
मैंने उसके कहने के साथ ही उसके निप्प्ल को हल्के से काट लिया। वो आ…………………ह कर उठी और बोली- चू…स खा…ली कर दे ! काट ! सेब क्या इतने आराम से काटते हैं?
यह सुन कर मुझे भी जोश चढ़ गया और मैं जोर जोर से उसके मोमों को चूसने और काटने लगा। इधर मेरे लन्ड की हालत खराब हो रही थी। तभी वो बोली- अपना लन्ड भी घुसा दे और फाड़ दे मेरी चूत !
बस फिर मैंने एकदम से लन्ड उसकी चूत में पेल दिया और धक्के लगाने लगा। अभी दस मिनट ही हुए थे, कि वो बोली- तेज और तेज !
मैंने जोरदार धक्के लगाने शुरु कर दिये। तेज और तेज कहते कहते उसने मेरा सर अपने मोमों पर जोर से दबा दिया और अपनी टाँगें मेरी कमर पर कस ली और नीचे से उछल उछल कर धक्के लगाने लगी।
इस जोरदार चुदाई से 5 मिनट में हम दोनों स्खलित हो गये और मैं उसके ऊपर लेट गया। हम दोनों अपनी सांसों को सम्भाल कर कुछ देर बाद उठे तब तक बारह बज चुके थे।
वो बोली- अब मेरी बेटी स्कूल से आने वाली है इसलिए फिर कभी !
हम उठ गये और अपने कपड़े पहनने लगे तो वो बोली- मजा आ गया ! मेरा पति तो बस 20-25 धक्कों में ही झड़ जाता है। फिर कब मिलोगे?
मैंने कहा- तुमने मुझे पहला सेक्स अनुभव कराया है ! तुम जब बोलोगी, मैं हाजिर हो जाऊंगा।
अब तक हम अपने कपड़े पहन चुके थे और वो बाहर जाने के लिये तैयार थी। ज़ब हम गेट के पास पहुँचे तो उसने फिर से मुझे पकड़ लिया और एक प्यारी सी पप्पी दी और बोली- अगली बार और मजे करेंगे।
उसके बाद हम और भी कई बार मिले और सेक्स किया। अगर वक्त मिला तो बाकी के किस्से भी लिख़ूंगा।
यह कहानी 1964 की गर्मियों की है। हमारे परिवार के सभी सदस्य एक विवाह में शरीक होने अपने गांव गये थे, हम तीन भाई-बहन और मां-बाबूजी। मैंने 12वीं की बोर्ड की परीक्षा दी थी और परिणाम का इंतज़ार कर रहा था।
मैं तीनो भाई बहन में सबसे बडा हूं। उस समय मैं 18वें साल में था और अन्य लडकों की तरह मुझे भी चूची और चूत की तलाश थी। लेकिन उस समय तक एक भी औरत या लडकी का मज़ा नहीं लिया था। बस माल को देखकर तरसता रहता था और लंड हिलाकर पानी निकाल कर संतुष्ट हो जाता था। दोस्तों के साथ हमेशा चूची और चूत की बातें होती थी। मुझसे छोटी बहन, माला है और उससे छोटा एक भाई।
मां का नाम मीना है और उस समय वो 34-35 साल की भरपूर जवान औरत थी। बाबूजी 40 साल के मजबूत कद-काठी के मर्द थे जो किसी भी औरत की जवानी की प्यास को बुझा सकते थे। बाबूजी की तरह मैं भी लम्बा और तगड़ा था लेकिन पता नहीं क्यों मुझे लड़कियों से बात करने में बहुत शरम आती थी, यहाँ तक कि मैं अपनी 16 साल की मस्त जवान बहन के साथ भी ठीक से बात नहीं करता था।
गांव में शादी में बहुत से लोग आये थे। चचेरी बहन की शादी थी, खूब धूमधाम से विवाह सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद धीरे-धीरे सभी मेहमान चले गये। मेहमानों के जाने के बाद सिर्फ घरवाले ही रह गये थे। पांच भाईयों में से सिर्फ मेरे बाबूजी गांव के बाहर काम करते थे, बाकी चारों भाई गांव में ही खेती-बाड़ी देखते थे। गांव की आधी से ज्यादा जमीन हमारी थी।
बाबूजी की छुट्टी खत्म होने को थी, हम लोग भी एक दिन बाद जाने वाले थे। हम वहाँ 17-18 दिन रहे। बहुत लड़कियों को चोदने का मन किया, बहुत औरतों की चूची मसलना चाहा लेकिन मैं कोरा का कोरा ही रहा। मेरा लन्ड चूत के लिये तरसता ही रह गया।
लेकिन कहते हैं कि ‘देर है लेकिन अन्धेर नहीं है’
उस दिन भी ऐसा ही हुआ। उस समय दिन के 11 बजे थे। औरतें घर के काम में व्यस्त थीं, कम उम्र के बच्चे इधर-उधर दौड़ रहे थे और आंगन में कुछ नौकर सफाई कर रहे थे। मेरे बाबूजी अपने भाईयों के साथ खेत पर गये थे। मैं चौकी पर बैठ कर आराम कर रहा था। तभी माँ मेरे पास आई और बगल में बैठ गई।
मेरी माँ मीना ने मेरा हाथ पकड़ कर एक लड़के की तरफ इशारा करके पूछा,"वो कौन है?"
वो लड़का आंखें नीची करके अनाज को बोरे में डाल रहा था। उसने सिर्फ हाफ-पैंट पहन रखा था।
"हां, मैं जानता हूँ, वो गोपाल है.. कंटीर का भाई !" मैंने माँ को जवाब दिया।
कंटीर हमारा पुराना नौकर था और हमारे यहा पिछले 8-9 सालों से काम कर रहा था। माँ उसको जानती थी।
मैंने पूछा,"क्यों, क्या काम है उस लड़के से?"
मां ने इधर उधर देखा और बगल के कमरे में चली गई। एक दो मिनट के बाद उसने मुझे इशारे से अन्दर बुलाया। मैं अन्दर गया और मीना ने झट से मेरा हाथ पकड़ कर कहा,"बेटा, मेरा एक काम कर दे..."
"कौन सा काम माँ !"
फिर उसने जो कहा वो सुनकर मैं हक्का बक्का रह गया।
"बेटा, मुझे गोपाल से चुदवाना है, उसे बोल कि मुझे चोदे...!"
मैं मीना को देखता रह गया। उसने कितनी आसानी से बेटे के उम्र के लड़के से चुदवाने की बात कह दी.....
"क्या कह रही हो.....ऐसा कैसे हो सकता है...." मैंने कहा।
"मैं कुछ नहीं जानती, मैं तीन दिन से अपने को रोक रही हूँ, उसको देखते ही मेरी बुर गरम हो जाती है, मेरा मन करता है की नंगी होकर सबके सामने उसे अपने अन्दर ले लूँ !" माँ ने मेरे सामने अपनी चूची को मसलते हुए कहा,"कुछ भी करो, बेटा गोपाल का लन्ड मुझे अभी चूत के अन्दर चाहिए !"
मीना की बातें सुनकर मेरा माथा चकराने लगा था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मां, बेटे के सामने इतनी आसानी से लण्ड और बुर की बात करेगी। मुझे यह जानकर अचम्भा हुआ कि मैं 18 साल का होकर भी किसी को अब तक चोद नहीं पाया हूँ तो वो गोपाल अपने से 20-22 साल बडी, तीन बच्चे की माँ को कैसे चोदेगा। मुझे लगा कि गोपाल का लन्ड अब तक चुदाई के लिये तैयार नहीं हुआ होगा।
"मां, वो गोपाल तो अभी छोटा है.. वो तुम्हें नहीं चोद पायेगा...." मैंने माँ की चूची पर हाथ फेरते हुए कहा,"चल तुझे बहुत मन कर रहा है तो मैं तुम्हें चोद दूंगा ..!"
मैं चूची मसल रहा था, माँ ने मेरा हाथ अलग नहीं किया। यह पहला मौका था कि मेरे हाथ किसी चूची को दबा रहा था और वो भी एक मस्त गुदाज़ औरत की, जो लोगों की नजर में बहुत सुन्दर और मालदार थी।
"बेटा, तू भी चोद लेना, लेकिन पहले गोपाल से मुझे चुदवा दे...अब देर मत कर ....बदले में तू जो बोलेगा वो सब करुंगी... तू किसी और लड़की या औरत को चोदना चाहता है तो मैं उसका भी इंतज़ाम कर दूंगी, लेकिन तू अभी अपनी माँ को गोपाल से चुदवा दे.. मेरी बुर एकदम गीली हो गई है।"
मीना ने सामने से चुदाई की पेशकश की है तो कुछ ना कुछ तो करना ही पड़ेगा। मैंने जोर जोर से 3-4 बार दोनों मस्त मांसल चूचियों को दबाया और कहा," तू थोड़ा इन्तज़ार कर....मैं कुछ करता हूँ !" यह कहकर मैंने माँ को अपनी बांहों में लेकर उसके गालों को चूसा और बाहर निकल कर आ गया।
दिन का समय था, सब लोग जाग रहे थे, किसी सुनसान जगह का मिलना आसान नहीं था। मैं वहाँ से निकल कर ‘कैटल-फार्म’ में आ गया जो आंगन से थोड़ी ही दूर पर सड़क के उस पार था। वहाँ उस समय जानवरों के अलावा और कोई नहीं था। वहाँ एक कमरा भी था नौकरों के रहने के लिये। उस कमरे में भी कोई नहीं था। मैंने सोचा क्यों ना आज माँ की चुदाई इसी कमरे में की जाये।
कमरे में एक चौकी थी और उस पर एक बिछौना भी था। मैं तुरंत आंगन वापस आया। मीना अभी भी बाहर ही बैठी थी और गोपाल को घूर रही थी। मैं उसके बगल में बैठ गया और कहा कि वो दस मिनट के बाद उस नौकर वाले कमरे में आ जाये। वहाँ से उठ कर मैं ग़ोपाल के पास आया और उसकी पीठ थप-थपा कर मेरे साथ आने को कहा। वो बिना कुछ बोले मेरे साथ आ गया। मैंने देखा कि मां के चेहरे पर मुस्कान आ गई है।
गोपाल को लेकर मैं उस कमरे में आया और दरवाज़ा खुला रहने दिया। मैं आकर बिछौने पर लेट गया और गोपाल से कहा कि मेर पैर दर्द कर रहा है, दबा दे.. यह कहते हुये मैंने अपना पजामा बाहर निकाल दिया। नीचे मैंने जांघिया पहना था। ग़ोपाल पांव दबाने लगा और मैं उससे उसके घर की बातें करने लगा।
वैसे तो गोपाल के घरवाले हमारे घर में सालों से काम करते हैं फिर भी मैं कभी उसके घर नहीं गया था। गोपाल की दादी को भी मैंने अपने घर में काम करते देखा था और अभी उसकी माँ और भैया काम करते हैं। गोपल ने बताया कि उसकी एक बहन है और उसकी शादी की बात चल रही है। वो बोला कि उसकी भाभी बहुत अच्छी है और उसे बहुत प्यार करती है।
अचानक मैंने उससे पूछा कि उसने अपनी भाभी को चोदा है कि नही। ग़ोपाल शरमा गया और जब मैंने दोबारा पूछा तो जैसा मैंने सोचा था, उसने कहा कि उसने अब तक किसी को चोदा नहीं है।
मैंने फिर पूछा कि चोदने का मन करता है या नहीं?
तो उसने शरमाते हुये कहा कि जब वो कभी अपनी माँ को अपने बाप से चुदवाते देखता है तो उसका भी मन चोदने को करता है। ग़ोपाल ने कहा कि रात में वो अपनी माँ के साथ एक ही कमरे में सोता है । लेकिन पिछले एक साल से माँ की चुदाई देख कर उसका भी लन्ड टाईट हो जाता है।
"फिर तुम अपनी माँ को क्यों नहीं चोदते हो..." मैंने पूछा, लेकिन गोपाल के जबाब देने के पहले मीना कमरे में आ गई और उसने अन्दर से दरवाजा बन्द कर दिया। ग़ोपाल उठकर जाने लगा तो मैंने उसे रोक लिया। गोपाल ने एक बार मीना के तरफ देखा और फिर मेरा पैर दबाने लगा।
"क्या हुआ मां?"
"अरे बेटा, मेरा पैर भी बहुत दर्द कर रहा है, थोड़ा दबा दे !" मीना बोलते बोलते मेरे बगल में लेट गई। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा, डर से या माँ को चोदने के खयाल से , मालूम नहीं। मैं उठ कर बैठ गया और माँ को बिछौने के बीचोंबीच लेटने को कहा।
मैं एक पैर दबाने लगा । ग़ोपाल चुपचाप खड़ा था।
"अरे ग़ोपाल, तुम क्यों खड़े हो, दूसरा पांव तुम दबाओ !" मैंने ग़ोपल से कहा लेकिन वो खड़ा ही रहा।
मेरे दो-तीन बार कहने के बाद गोपाल दूसरे पांव को दबाने लगा। मैंने माँ को आंख मारी और वो मुस्कुरा दी।
"मां, कहां दर्द कर रहा है?"
"अरे पूछ मत बेटा, पूरा पाव और छाती दर्द कर रहा है, खूब जोर से पैर और छाती को दबाओ।"
मां ने खुल कर बुर और चूची दबाने का निमंत्रण दे दिया था। मैं पावं से लेकर कमर तक एक पर को मसल मसल कर मजा ले रहा था जब कि गोपाल सिर्फ घुटनों तक ही दबा रहा था। मैंने गोपाल का एक हाथ पकड़ा और माँ की जांघों के ऊपर सहलाया और कहा कि तुम भी नीचे से ऊपर तक दबाओ। वो हिचका लेकिन मुझे देख देख कर वो भी मीना लम्बी लम्बी टांगों को नीचे से ऊपर तक मसलने लगा।
2-3 मिनट तक इस तरह से मजा लेने के बाद मैंने कहा,"मां साड़ी उतार दो...तो और अच्छा लगेगा..."
"हां, बेटा, उतार दो..."
"गोपाल, साड़ी खोल दो।" मैंने गोपाल से कहा।
उसने हमारी ओर देखा लेकिन साड़ी खोलने के लिये हाथ आगे नहीं बढ़ाया।
"गोपाल, शरमाते क्यों हो, तुमने तो कई बार अपनी माँ को नंगी चुदवाते देखा है...यहां तो सिर्फ साड़ी उतारनी है, चल खोल दे।" और मैंने गोपाल का हाथ पकड़ कर साड़ी की गांठ पर रखा। उसने शरमाते हुये गांठ खोली और मैंने साड़ी माँ के बदन से अलग कर दी। काले रंग के ब्लाऊज़ और साया में गजब की माल लग रही थी।
"मालकिन, आप बहुत सुन्दर हैं..." अचानक गोपाल ने कहा और प्यार से जांघों को सहलाया।
"तू भी बहुत प्यारा है.." मीना ने जबाब दिया और हौले से साया को अपनी घुटनों से ऊपर खींच लिया।
माँ के सुडौल पैर और पिंडली किसी भी मर्द को गर्म करने के लिये खाफी थे। हम दोनों पैर दबा रहे थे लेकिन हमारी नजर मीना की मस्त, गोल-गोल, मांसल चूचियों पर थी। लग रहा था जैसे कि चूचियां ब्लाऊज़ को फाड़ कर बाहर निकल जायेंगी।
मेरा मन कर रहा था कि फटाफट माँ को नंगा कर बूर मे लन्ड पेल दूं। मेरा लंड भी चोदने के लिये तैयार हो चुका था। और इस बार घुटनों के ऊपर हाथ बढा कर मैंने हाथ साया के अन्दर घुसेड़ दिया और अन्दरुनी जांघों को सहलाते हुये जिन्दगी में पहली बार बुर को मसला। एक नहीं, दो नहीं, कई बार बुर मसला लेकिन माँ ने एक बार भी मना नहीं किया।
माँ साया पहने थी और बुर दिखाई नहीं पर रही थी। साया ऊपर नाभि तक बंधा हुआ था। मैं बुर को देखना चाहता था। एक दो बार बुर को फिर से मसला और हाथ बाहर निकाल लिया।
"मां, साया बहुत कसा बंधा हुआ है, थोड़ा ढीला कर लो.. "
मैंने देखा कि गोपाल अब आराम से मीना की जांघों को मसल रहा था। मैंने गोपल से कहा कि वो साया का नाड़ा खोल दे। तीन चार बार बोलने के बाद भी उसने नाड़ा नहीं खोला तो मैंने ही नाड़ा खींच दिया और साया ऊपर से ढीला हो गया।
मैं पांव दबाना छोड़कर माँ की कमर के पास आकर बैठ गया और साया को नीचे की तरफ ठेला। पहले तो उसका चिकना पेट दिखाई दिया और फिर नाभि। कुछ पल तो मैंने नाभि को सहलाया और साया को और नीचे की ओर ठेला।
अब उसकी कमर और बुर के ऊपर का चिकना चिकना भाग दिखाई पड़ने लगा। अगर एक इंच और नीचे करता तो बुर दिखने लगती।
"आह बेटा, छाती बहुत दर्द कर रहा है.." मीना ने धीरे से कहा । साया को वैसा ही छोड़कर मैंने अपने दोनों हाथ माँ की मस्त और गुदाज चूचियों पर रखे और दबाया। गोपाल के दोनों हाथ अब सिर्फ जांघो के ऊपरी हिस्से पर चल रहा था और वो आंखे फाड़ कर देख रहा था कि एक बेटा कैसे माँ की चूचियां मसल रहा है।
"मां, ब्लाउज खोल दो तो और अच्छा लगेगा।" मैंने दबाते हुए कहा।
"खोल दे " उसने जबाब दिया और मैंने झटपट ब्लाउज के सारे बटन खोल डाले और ब्लाउज को चूची से अलग कर दिया।
मां की गोल-गोल, उठी हुई और मांसल चूची देख कर माथा झनझना गया। मुझे याद नहीं था कि मैंने आखरी बार कब माँ की नंगी चूची देखी थी। मैं जम कर चूची दबाने लगा।
"कितना टाईट है, लगता है जैसे किसी ने फ़ुटबाल में कस कर हवा भर दी है।" मैंने घुन्डी को कस कर मसला और ग़ोपाल से कहा," क्यों गोपाल कैसा लग रहा है?" मैं जोर जोर से चूची को दबाता रहा।
अचानक मैंने देखा कि गोपाल का एक हाथ माँ की दोनों जांघों के बीच साया के ऊपर घूम रहा है। एक हाथ से चूची दबाते हुए मैंने गोपाल का वो हाथ पकड़ा और उसे माँ की नाभि के ऊपर रख कर दबाया।
"देख, चिकना है कि नहीं?" मैं उसके हाथ को दोनों जांघों के बीच बुर की तरफ धकेलने लगा। दूसरे हाथ से मैं लगातार चूचियों का मजा ले रहा था। मुझे याद आया कि बचपन में इन चूचियों से ही दूध पीता था। मैं माँ के ऊपर झुका और घुन्डी को चूसने लगा।
तभी माँ ने फुसफुसाकर कान में कहा,"बेटा, तू थोड़ी देर के लिये बाहर जा और देख कोई इधर ना आये.."
मैं दूध पीते पीते गोपाल के हाथ के ऊपर अपना हाथ रख कर साया के अन्दर ठेला और गोपाल का हाथ माँ के बुर पर आ गया। मैंने गोपाल के हाथों को दबाया और गोपाल बुर को मसलने लगा । कुछ देर तक हम दोनों ने एक साथ बुर को मसला और फिर मैं खड़ा हो गया। ग़ोपाल का हाथ अभी भी माँ की बुर पर था लेकिन साया के नीचे। बुर दिख नहीं रही थी।
मैंने अपना पजामा पहना और गोपाल से कहा,"जब तक मैं वापस नहीं आता, तू इसी तरह मालकिन को दबाते रहना। दोनों चूचियों को भी खूब दबाना।"
मैं दरवाजा खोल कर बाहर आ गया और पल्ला खींच दिया। आस पास कोई भी नहीं था। मैं इधर उधर देखने लगा और अन्दर का नजारा देखने का जगह ढूंढने लगा। जैसा हर घर में होता है, दरवाजे के बगल में एक खिड़की थी। उसके दोनों पल्ले बन्द थे। मैंने हलके से धक्का दिया और पल्ला खुल गया। बिस्तर साफ साफ दिख रहा था।
मीना ने गोपाल से कुछ कहा तो वो शरमा कर गर्दन हिलाने लगा।मीना ने फिर कुछ कहा और गोपाल सीधा बगल में खड़ा हो गया। मीना ने उसके लन्ड पर पैंट के ऊपर से सहलाया और ग़ोपाल झुक कर साया के ऊपर से बुर को मसलने लगा। एक दो मिनट तक लंड के ऊपर हाथ फेरने के बाद मीना ने पैंट के बटन खोल डाले और गोपाल नंगा हो गया। मीना ने झट से उसका टनटनाया हुआ लंड पकड लिया और उसे दबाने लगी।
मां को मालूम था कि मैं जरुर देख रहा हूँ, उसने खिड़की के तरफ देखा। मुझसे नजर मिलते ही वो मुस्कुरा दी और लंड को दोनों हाथों से हिलाने लगी। गोपाल का लंड देख कर वो खुश थी। उधर गोपाल ने भी बुर के ऊपर से साया को हटा दिया था और मैंने भी पहली बार एक बुर देखी वो भी अपनी माँ की, जिसे मेरी आंखों के सामने एक लड़का मसल रहा था।
मीना ने कुछ कहा तो गोपाल ने साया को बाहर निकाल दिया। वो पूरी नंगी थी। उसकी गठी हुई और लम्बी टांगें और जांघ बहुत मस्त लग रही थी। बुर पर बहुत छोटे छोटे बाल थे, शायद 6-7 दिन पहले झांट साफ किया था।
मीना लंड की टोपी खोलने की कोशिश कर रही थी। उसने गोपाल से फिर कुछ पूछा और गोपाल ने ना में गर्दन हिलाई। शायद पूछा हो कि पहले किसी को चोदा है या नहीं। मीना ने गोपाल को अपनी ओर खींचा और खूब जोर जोर से चूमने लगी और चूमते-चूमते उसे अपने ऊपर ले लिया।
अब मुझे मीना की बुर नहीं दिख रहा था। मीना ने हाथ नीचे की ओर बढ़ाया और अपने हाथ से लंड को बुर के छेद पर रखा। मीना ने गोपाल से कुछ कहा और वो दोनों चूची पकड़ कर धीरे धीरे धक्का लगा कर चुदाई करने लगा।
गोपाल अपने से 20 साल बड़ी गांव की सबसे मस्त और सुन्दर माल की चुदाई कर रहा था। मैं अपने लंड की हालत को भूल गया और उन दोनों की चुदाई देखने लगा। गोपाल जोर जोर से धक्का मार रहा था और मीना भी चूतड़ उछाल उछाल अपने बेटे की उम्र के लड़के से चुदाई का मजा ले रही थी। यूँ तो गोपाल के लिये चुदाई का पहला मौका था लेकिन वो पिछले साल से हर रात अपनी माँ को नंगी देखता था, बाप से चुदवाते।
मैं देखता रहा और गोपाल जम कर मेरी माँ को चोदता रहा और करीब 15 मिनट के बाद वो माँ के ऊपर ढीला हो गया। मैं 2-3 मिनट तक बाहर खड़ा रहा और फिर दरवाजा खोल कर अन्दर आ गया। मुझे देखते ही गोपाल हड़बड़ा कर नीचे उतरा और अपने हाथ से लंड को ढक लिया। लेकिन मीना ने उसका हाथ अलग किया और मेरे सामने गोपाल के लंड को सहलाने लगी।
मां बिल्कुल नंगी थी। उसने दोनों टांगों को फैला रख्खा था और मुझे बुर का फांक साफ साफ दिख रहा था। लंड को सहलाते हुये मीना बोली,"बेटा, गोपाल में बहुत दम है...मेरा सारा दर्द खत्म हो गया।" फिर उसने गोपाल से पूछा,"क्यों, कैसा लगा..?"
मैं उसकी कमर के पास बैठ कर बुर को सहलाने लगा। बुर गोपाल के रस से पूरी तरह से गीली हो गई थी।
"बेटा, साया से साफ कर दे।"
मैं साया लेकर बुर के अन्दर बाहर साफ करने लगा और उसने गोपाल से कहा कि वो गोपाल को बहुत पसन्द करती है और उसने चुदाई भी बहुत अच्छी की। उसने गोपाल को धमकाया कि अगर वो किसी से भी इसके बारे में बात करेगा तो वो बड़े मालिक (मेरे बड़े काका) से बोल देगी और अगर चुप रहेगा तो हमेशा गोपाल का लंड बुर में लेती रहेगी।
गोपाल ने कसम खाई कि वो किसी से कभी मीना मालकिन के बारे में कुछ नहीं कहेगा। मीना ने उसे चूमा और कपड़े पहन कर बाहर जाने को कहा।
ग़ोपाल बहुत खुश हुआ जब माँ ने उससे कहा कि वो जल्दी फिर उससे चुदवायेगी। मैंने गोपाल से कहा कि वो आंगन जाकर अपना काम करे। गोपाल के जाते ही मैंने दरवाजा अन्दर से बन्द किया और फटाफट नंगा हो गया। मेरा लन्ड चोदने के लिये बेकरार था। माँ ने मुझे नजदीक बुलाया और मेरा लन्ड पकड़ कर सहलाने लगी।
"हाय बेटा, तेरा लौड़ा तो बाप से भी लम्बा और मोटा है..., लेकिन अपनी माँ को मत चोद। तू घर की जिस किसी भी लड़की को चोदना चहता है, मैं चुदवा दूंगी.. लेकिन मादरचोद मत बन।"
मैंने अपना लंड अलग किया और माँ के ऊपर लेट गया। लंड को बुर के छेद से सटाया और जम कर धक्का मारा...
"आह्ह्ह्ह्ह......"
मैं माँ के कन्धों को पकड़ कर चोदने लगा।
"साली, अगर मुझे मालूम होता कि तू इतनी चुदासी है तो मैं तुझे 4-5 साल पहले ही चोद डालता, बेकार का हत्तू मार कर लौड़े को तकलीफ नहीं देता।" कहते हुये मैंने जम कर धक्का मारा.. "आअह्ह्ह्ह्ह्ह....मजा आआआअ ग...याआअ.."
मां ने कमर उठा कर नीचे से धक्का मारा और मेरा माथा पकड़ कर बोली,"बेटा, वो तो गोपाल से चुदवाने के लालच में आज तेरे सामने नंगी हो गई, वरना कभी मुझे हाथ लगाता तो एक थप्पड़ लगा देती।
मैंने धक्का मारते मारते माँ को चूमा और चूची को मसला।
"साली, सच बोल, गोपाल के साथ चुदाई में मजा आया क्या?" मेरा लौड़ा अब आराम से अपनी जन्मभूमि में अन्दर-बाहर हो रहा था।
"सच बोलूं बेटा, पहले तो मैं भी घबरा रही थी कि मैं मुन्ना के उम्र के लड़के के सामने रन्डी जैसी नंगी हो गई हूँ लेकिन अगर वो नहीं चोद पाया तो !" माँ ने गोपाल को याद कर चूतड़ उछाले और कहा," गोपाल ने खूब जम कर चोदा, लगा ही नहीं कि वो पहली बार चुदाई कर रहा है.. मैं तो खुश हो गई और अब फिर उससे चुदवाउंगी।"
"और मैं कैसा चोद रहा हूँ मेरी जान ?" मैंने उसके गालों को चूसते हुये पूछा।
"बेटा, तेरा लौड़ा भी मस्त है और तेरे में गोपाल से ज्यादा दम भी है....मजा आ रहा है...."
और उसके बाद हम जम कर चुदाई करते रहे और आखिर में मेरे लंड ने माँ के बुर में पानी छोड़ दिया। हम दोनों हांफ रहे थे। कुछ देर के बाद जब ठण्डे हो गये तो हमने अपने कपड़े पहने और बिस्तर ठीक किया।
"बाप रे, सब पूछेंगे कि मैं इतनी देर कहा थी, तो क्या बोलूंगी..." माँ अब दो दो लंड खाने के बाद डर रही थी।
मैंने उसे बांहों में जकड़ कर कहा, "रानी, तुम डरो मत। मैं साथ हूँ ना... किसी को कभी पता नहीं चलेगा तुमने बेटे और नौकर से चुदवाया है।" मैंने माँ के गालों को चूमा और उससे खुशामद किया कि वो दो-ढाई घंटे के बाद फिर इस कमरे में आ जाये जिसमें से कि मैं उसे दुबारा चोद सकूँ।
"एक बार में मन नहीं भरा क्या..?" उसने पूछा..
"नहीं साली, तुमको रात दिन चोदता रहूँगा फिर भी मन नहीं भरेगा... जरुर आना.."
"आउंगी..लेकिन एक शर्त पर...!" माँ ने मेरा हाथ अपनी चूची पर रखा।
"क्या शर्त?" मैंने चूची जोर से मसला...
"गोपाल भी रहेगा ...." माँ फिर गोपाल का लौड़ा चाहती थी।
"साली, तू गोपाल की कुतिया बन गई है... ठीक है, इस बार मैं अपनी गोदी में लिटा कर गोपाल से चुदवाउंगा।
"तो ठीक है, मैं आउंगी...."
आंगन के रास्ते में मैंने उससे पूछा कि वो पहले कितने लौड़े खा चुकी है.. तो उसने कहा कि बाद में बतायेगी।
आंगन में पहुंचते ही बड़ी काकी ने पूछा- माँ को लेकर कहां गया था। सब खाने के लिये इंतजार कर रहे हैं।
मैंने जबाब दिया कि मैं माँ को गाछी (फार्म हाउस) दिखाने ले गया था। फिर किसी ने कुछ नहीं पूछा।
प्रेषक : मयंक शर्मा
मैं बहुत समय से हिल्म्स का सदस्य हूँ और आज मैं भी अपना सेक्स का अनुभव आप सब पाठकों के साथ शेयर करना चाहता हूँ। मेरी शादी को एक साल हो गया है। मेरी शादी दिसम्बर में हुई थी, उस समय बहुत ठण्ड थी लेकिन मैं तो बस अपनी पहली रात के बारे में सोच-सोच कर मन ही मन खुश हो रहा था। शादी की सारी थकन तो मानो सुहागरात के कारण महसूस हो ही नहीं रही थी।
अधिकतर मेहमान जा चुके थे पर तब भी कुछ मेहमान थे और वो बाहर के कमरे में सो रहे थे। हमारे लिए अंदर का कमरा तैयार किया गया था। उस रात मैं पहली बार चुदाई करने वाला था, इससे पहले बस पिक्चर्स में देखा था।
मेरा लंड 6 इंच लम्बा है और उस रात पूरे शबाब पर था। वो रात मेरे और मेरी बीवी दोनों के लिए यादगार था क्योंकि हम दोनों पहली बार सेक्स करने वाले थे।
जब सब सोने चले गए तो हम दोनों भी कमरे में आ गए। बात करते-करते मैंने उसे बाँहों में ले लिया और फिर एक किस लिया। हम शादी से पहले मिलते जरूर थे तब हमने एक दूसरे को गले लगाया था और किस भी किया था तो किस का अनुभव तो हो गया था। फिर हम बहुत देर तक एक दूसरे को चूमते चाटते रहे और मैंने उसके होंठों को अपने मुँह में भींच लिया। फिर धीरे-धीरे मैंने उसका लहंगा और जेवर उतारे, उसकी पीठ पर हाथ फेरता रहा और वो भी मुझे सहलाती रही। फिर मैंने उसका ब्लाऊज भी उतार फेंका और उसने भी मुझे सिर्फ अंडरवियर में कर दिया।
अब वो सिर्फ ब्रा पेंटी में थी और मैं अंडरवियर में। हम दोनों ऐसे ही रजाई के अंदर एक दूसरे से लिपट कर लेट गए और शरीर गर्म करने लगे। जब गर्माहट शरीर में फैल गई तो मैंने अपनी अंडरवियर और उसकी ब्रा पेंटी उतार फेंकी। फिर हम दोनों 69 पोजिशन में एक दूसरे के अंगों को चूसने लगे। मुझे उसकी चिकनी चूत चाटने में मजा आ रहा था और यही मजा लेने क लिए ही मैंने उसे शादी से एक दिन पहले ही चूत की शेविंग करने को कहा था और खुद के लंड की भी सफाई की थी।
जब वो लंड चूस रही थी तो मुझे शरारत सूझी और मैंने जोर से अपने लंड को उसके मुँह में घुसेड़ दिया जो सीधा उसके तालू में जा टकराया और वो बेड पर ही उछल गई।
जब हमारे चुसाई कार्यक्रम को बहुत देर हो गई तो फिर चुदाई की तैयारी करने लगे।
मैंने अपने दोस्तों द्वारा गिफ्ट किया हुआ डोटेड कॉन्डम निकाला और अपने तने हुए लंड पर चढ़ा लिया। मैंने अपनी बीवी को पलंग पर सीधा लिटाया और उसके ऊपर आ गया। फिर मैं धीरे-धीरे अपने लंड से उसकी चूत सहलाने लगा ताकि उसकी चूत गीली हो जाये और चुदाई में दर्द ना हो।
उसी समय मैं उसके मम्मों को दबाने लगा........ और वो धीरे-धीरे सिसकियाँ लेने लगी। उसके मम्मे भी काफी कड़क थे जो अब तो दब-दब कर, चुस-चुस कर बड़े और भारी हो गए हैं। मम्मों को दबाते दबाते मैं उन्हें चूसने लगा और उसके गले पर भी चूमता रहा और वो सिसकियाँ लेती रही...........
फिर धीरे से मैंने अपने तना हुआ लंड उसकी चूत के मुँह पर लगाया और अंदर डालने लगा। पर जैसे ही डालने को हुआ, वो दर्द से तड़पने लगी और उसके मुँह से आः ह्ह्ह ........ निकलने लगी।
तुरंत मैंने अपने लंड चूत पर से हटाया और उसका मुँह अपने हाथ से बंद किया ताकि उसकी आवाज बाहर मेहमानों के कान में ना चली जाये।
अब तो मैं यह सोच रहा था कि कैसे इसकी चुदाई करूँ.....
मैंने उसकी चूत पर अपना थूक लगा कर उसे गीला किया और फिर से उसके पैर उठा कर लंड अंदर डालने लगा। पर वो फिर से आ आह्ह ह्ह्ह .... करने लगी और कहने लगी मत करो- जान ......... बहुत दर्द हो रहा है !
तब मैंने उसका मनोबल बढ़ाया और धीरे-धीरे लंड अंदर करने लगा और वो आ आह्ह्ह् ह्ह्ह्ह ....... उम्म्मह्ह्ह्ह्ह् ह्ह्ह्ह...... करने लगी।
फिर मैंने हिम्मत करके थोड़ा ज्यादा दम लगा कर लंड उसकी चूत के अंदर सरकाया। कुछ ही देर में मेरे लंड को उसकी चूत को भेदने में सफलता मिल गई और वो एक दम से ऊह्ह्ह्ह मम्मी ईईई..................कर के निढाल हो गई और मैं भी लंड उसकी चूत में रखे ही उसके ऊपर लेट गया और उसे होश में लाने लगा। मैं उसे हिलाने डुलाने लगा पर वो होश में नहीं आई। तब मैंने उसके गले और वक्ष पर चूमना शुरू किया। मैं उठ कर पानी नहीं ला पा रहा था क्योंकि ऐसा करने के लिए लंड बाहर निकालना पड़ता। फिर मैं उसे हल्के से काटने लगा, तब उसे होश आया और होश में आते ही फिर से आःह्ह्ह...... बहुत दर्द हो रहा है ! कहने लगी।
फिर मैंने लंड को चूत में अंदर-बाहर करना शुरु किया जैस मैं पिक्चर में देखता था और उसे चूमता भी रहा ताकि उसकी आवाज बाहर ना जाये और वो हल्की आवाज में ऊऊऊम्म्म्म्म...... आ आअह्ह्ह्ह्ह करने लगी..... और मैं उसकी खूब चुदाई करता रहा.....
फिर लंड को अंदर ही डाले मैंने करवट बदल ली और वो मेरे ऊपर आ गई। फिर मैंने अपनी गांड उठा कर उसकी चुदाई चालू कर दी और अब वो मजे लेने लगी थी। वो भी कहने लगी थी- करते रहो जानू.....
और मैं उसे चोदता रहा !
आप सब यकीन नहीं मानेंगे- उस रात को मैंने उसे पूरे 50 मिनट तक चोदा जो कि मेरे लिए भी आश्चर्यजनक था कि इतनी देर चुदाई करने पर भी मैं झड़ा नहीं। जब बहुत देर हो गई तो फिर से मैंने उसे अपने नीचे लिटा लिया और जोर से चोदने लगा और वो तो बस आःह्ह्ह ...... ऊऊउह्ह्ह्ह्ह...... .मम्मीईईई ..... आ आआह्ह्ह्ह ......... मजा आ गया ! कहती रही।
और फिर मैंने अपनी स्पीड तेज कर दी और उसकी आवाज भी तेज होने लगी.......
उस समय मैं भी जोश में आ गया था, तो मैंने भी आवाज की और मेहमानों की परवाह नहीं की, सोचा कि यही तो सोचेंगे कि चलो सुहागरात मजे से मन रही है ! यही सोच कर मैं निश्चिन्त हो कर अपनी बीवी को चोदने लगा और जैसे ही मैं झड़ने के करीब आया तो अपने लंड की चोदने की रफ़्तार बहुत तेज कर दी। मेरी बीवी मेरी पीठ को खरोंचने लगी और कुछ ही देर में मैंने अपने लंड का वीर्य छोड़ दिया और वो सीधा कॉन्डम में इकट्ठा हो गया।
फिर कुछ देर हम दोनों ऐसे ही लेटे रहे। जैसे ही मैंने लंड निकाला तो कॉन्डम पूरा लाल था जो मेरी कुंवारी बीवी की सील टूटने की वजह से निकले खून से लाल हुआ था। हम इस बारे में पहले ही फोन पर बात कर चुके थे इसलिए खून देख कर मेरी बीवी भी डरी नहीं और उसके मन में भी संतोष था कि वो अपनी जिंदगी में पहली बार अपने पति से ही चुदी।
फिर हम दोनों बाथरूम मैं अपने लंड और चूत साफ़ करने चले गए और फिर ऐसे ही नंगे एक दूसरे से लिपट कर सो गए। फिर एक घंटे बाद दुबारा से चुदाई की। उस रात पूरी तीन बार हमारा चुदाई कार्यक्रम चला।
इस तरह मैंने अपनी कुंवारी बीवी की सील तोड़ के उसे सुहागन बना दिया।
आपको यह कहानी कैसी लगी जरूर बताएँ।
लेखिका : रीता शर्मा
हम दोनों ने अब शर्म छोड़ सी दी थी। वो मुझसे रोज अपनी पीठ दबवाती, शायद मजे लेने के लिये ! मैं भी उसे सहला सहला कर मस्त कर देता था। फिर वो भी मेरी पीठ दबा देती थी, मेरी टांगें, जांघें मस्त हो कर दबाती थी, फिर मेरे लण्ड के कड़कपन को जी कड़ा करके जी भर कर निहारती थी।
यह सिलसिला बहुत दिनों तक चलता रहा। हम दोनों इस कार्य में वासना में लोटपोट हो जाते थे। हाँ, एक दो बार मैंने भाभी के मम्मे भी दबा दिये थे, उसे बहुत ही मजा आया था। वो भी जोश में आकर मेरा लण्ड दो तीन बार दबा चुकी थी। एक बार यह दूरी भी मिट गई।
एक दिन मालिश के दौरान भाभी ने कहा- नीरू, एक बात कहूँ?
मैंने प्रश्नवाचक निगाहों से उसे देखा। उसकी नजरें झुक गई।
आज अपना पजामा उतार दो ... मुझे देखना है ! कहते कहते भाभी हिचकिचा सी गई।
तो मैं अपनी आंखे बंद कर लेता हूँ, मेरा पजामा नीचे खींच लो !
नहीं, आंखे बंद नहीं करो... पर मुझे मत देखना !
भाभी ने धीरे से मेरा पजामा खींच कर नीचे खिसका दिया। मैं उसके सुन्दर से चेहरे को एकटक देखता रहा। उसके चेहरे पर आते जाते भाव देखने लगा। उसकी आंखें नशीली हो उठी थी। लाल डोरे उभर आये थे।
मत देखो ना, शरम आती है !
कब तक शरमाओगी भाभी ... जी खोल कर करो जो करना है।
वो बिस्तर के नीचे मेरे पास आ गई और मेरी आंखों पर अपना हाथ रख दिया। मेरे लण्ड की लाल टोपी को उसने उघाड़ लिया और उस पर झुक गई। मेरा लण्ड उसने मुख में भर लिया। मेरे मुख से एक सिसकी निकल पड़ी। भाभी ने मुझे मुड़ कर देखा- भैया, कैसा लगा ... और करूँ क्या ?
भाभी पूरा अन्दर तक घुसेड़ ले, बहुत मजा आ रहा है ! मैने भाभी के चूतड़ों को पकड़ कर अपनी ओर खींचा। उसका जिस्म मेरे और करीब आ गया। वो मेरे ऊपर चढ़ गई ... उसने अपना पेटीकोट ऊपर खींच लिया और अपनी नंगी चूत मेरे मुख पर जमा दी। उसकी गीली चूत से मेरा मुख भी गीला हो गया था। एक तेज वीर्य युक्त सुगंध मुझे आई। यह जवानी से लदी स्त्री के यौनस्त्राव की सुगन्ध थी।
मेरी जीभ लपलपा उठी। उसकी प्यारी सी खुली हुई चूत को मैं चाटने लगा, भाभी सिसकने लगी। भाभी अपने हाथ से अपने पेटीकोट को मेरे चेहरे पर डाल कर अपना नंगापन छुपाने लगी। तभी उसका कड़ा दाना मेरी जीभ से टकरा गया और उसके मुख से जोर से आह निकल गई। वो अपने पांव समेट कर ऊंची हो गई। उसकी प्यारी सी रसीली चूत मुझे अब साफ़ दिख रही थी। उसका बड़ा सा दाना साफ़ चूत के ऊपर नजर आ रहा था। उसकी गाण्ड के बीच उसका मुस्कराता हुया छोटा सा भूरा सा छेद अन्दर बाहर सिकुड़ता हुआ नजर आ रहा था।
मैंने अपनी अंगुली थूक से गीली करके उसके छेद में दबा दी और उसमें गुदगुदी करता हुआ उसके आस पास अंगुली घुमाने लगा। उसने अपनी गाण्ड का छेद ढीला कर दिया और मैंने हौले से अपनी एक अंगुली छेद में घुसा दी। साथ ही में मैंने उसकी चूत फिर से अपने मुख से चिपका ली।
उसने भी यही किया, लण्ड चूसते चूसते मेरी गाण्ड में अंगुली घुसा कर घुमाने लगी। हम दोनों उत्तेजना के सागर मे गोते लगा रहे थे। काफ़ी देर तक यह खेल खेलने के पश्चात भाभी उठ गई। उसकी आंखें वासना से गुलाबी हो गई थी। मेरी नाक में, मुख मण्डल पर उसकी चूत की चिकनाई फ़ैली हुई थी। वो घूम कर मेरी ओर हो गई और मेरे लण्ड पर बैठ गई।
भाभी, कैसा मजा आ रहा है...?
भाभी ने मेरे होठों पर अपनी अंगुली रख दी। फिर एक हाथ से मेरा लण्ड पकड़ा और उसे हिलाया। तन्नाया हुआ लण्ड एक मस्त डाली की तरह झूल गया। फिर उसने लण्ड का लाल टोपा अपनी चूत की दरार पर रख दिया। और अपनी चूचियों को मेरी नजरों के आगे झुला दिया। वो मुझ पर झुकी जा रही थी। मैंने अनायास ही उसके दोनों स्तन हाथों में थाम लिये और उसके कड़े चुचूक मसल डाले। मेरा लण्ड उसकी चूत मे फ़िसलता हुआ अन्दर समाने लगा। एक तेज मीठी सी गुदगुदी लण्ड में उठने लगी। मेरे शरीर का रोम रोम पिघलने लगा।
मेरी मांऽऽऽऽ ! आह री ... मर गई मैं तो... !!!
भाभीऽऽऽऽ ... उफ़्फ़्फ़ ! जोर से घुसेड़ो ... ! मेरे मुख से बरबस निकल पड़ा।
पूरा लण्ड घुसेड़ने के बाद वो मुझ पर अपना भार डाल कर लेट गई और धीरे-धीरे चूत घिसने लगी। मैं असीम आनन्द में खो चला !!! भाभी भी मदमस्त हो कर आंखें बन्द किये अपनी चूत ऊपर नीचे घिसने लगी थी। मेरी कमर भी अपने आप ही ताल मिलाने लग गई थी। वो कभी ऊपर उठ कर अपने स्तन को देखती और मुझे उसे और जोर से दबाने को कहती और फिर मस्ती में चीख सी उठती थी।
अब उसकी रफ़्तार बढ़ने लगी थी। उसके केश मेरे चेहरे पर गिरे जा रहे थे। उसके पतले अधर पत्तियों जैसे कांप रहे थे। उसका यह वासनामय रूप किसी काम की देवी की तरह लग रहा था। तभी उसके मुख से एक चीख सी निकली और वो झड़ने लगी- हाय मेरे नीरू, मैं तो गई... मेरा तो निकला...
उसकी चूत में लहरें चलने लगी। तभी मुझे भी लगा कि मेरा माल निकलने को है, मैंने उसे नीचे की ओर खींच कर दबा लिया। वो कराह उठी और मेरा रस उसकी चूत में भरने लगा। हम दोनों कुछ देर तक झड़ने के बाद भी यूँ ही पड़े रहे, फिर भाभी मेरे ऊपर से हट गई। उसका पेटीकोट कमर से नीचे परदे की भांति नीचे गिर कर उसे ढक लिया। उसने जल्दी से बटन लगा लिये।
चलो पजामा ऊपर खींच लो...
भाभी बहुत मजा आया ... एक बार और करें ...?
ओय होये ... अब लगा ना चस्का, आज तेरे भैया की नाईट ड्यूटी भी है, रात को देखेंगे ! भाभी ने दूसरे दौर की सहमति दे दी, पर रात को।
मैं तैयार हो कर कॉलेज चला गया। सारे दिन गुमसुम सा रहा, चुदाई की मीठी-मीठी यादें पीछा नहीं छोड़ रही थी। बड़ी मुश्किल से शाम आई तो रात आने का नाम ही नहीं ले रही थी।
घर के सभी लोग सो चुके थे। भाभी ने अपना कमरा अन्दर से बन्द करके अपनी चौक की खिड़की खोली और बाहर कूद आई ताकि लगे कि कमरा तो अन्दर से बंद है।
और मेरे कमरे में आते ही दरवाजा ठीक से बंद कर दिया। लाईट बन्द करके वो मेरे बिस्तर में मेरे साथ लेट गई। भाभी धीरे से फ़ुसफ़ुसाई- नीरू, आज तबला बजा दे...
मेरा लण्ड तो पहले ही बेताब हो रहा था, लग रहा था कि नई नई शादी हुई हो जैसे !!!
तबला क्या ... ? बोलो ना... !
वो हिचकचाते हुये बोली- श्... श्... वो, मेरा मतलब है गाण्ड बजानी है !
वो कैसे ...
म बोलते बहुत हो ... गाण्ड नहीं मारी है क्या ? वो झुंझला कर बोली।
मैंने चुप्पी साध ली और पेटीकोट ऊपर कर दिया। मैंने भी अपना पजामा उतार लिया और अपना लण्ड उसकी प्यारी सी दरार में घुसा दिया। उसने अपनी गाण्ड में चिकनाई लगा रखी थी। सो देखते ही देखते लण्ड उसके टाईट छेद में घुस पड़ा।
आनन्द भरी सिसकियाँ एक बार फिर से गूंज उठी। उसकी गाण्ड चुदने लगी। मेरे लिये यह सब एक आनन्ददायक घटना थी... अब हम रोज ही अपनी वासना शांत कर लेते थे। भाभी का स्नेह मुझ पर दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था। सच पूछो तो मैं भी रीता भाभी के बिना नहीं रह पाता था।
मेरे देवर ने मुझे अपनी कहानी लिखने को कहा तो मैंने उसी को अपनी कलम दे दी।
बीते दिन एक सपने की तरह लगते हैं ! हैं ना ... ? कोई ऐसा प्यारा सा इन्सान मिल जाये जो किसी की सभी बाते गुप्त रखते हुये जिन्दगी को रंगीन बना दे और काश ऐसे दिन कभी खत्म ना हो ...
मैं आसमान में सितारों के साथ विचरण करती रहूँ, देवर जैसा कोई है क्या ...
लेखिका : रीता शर्मा
घर में बस हम दो भाई थे। दिनेश मुझसे दस साल बड़ा था। वो एक फ़ेक्टरी में काम करता था। भाभी रीता भी मुझसे सात साल बड़ी थी। मम्मी पापा नौकरी करते थे। घर का सारा काम भाभी पर आ गया था। मुझे यह देख कर बहुत बुरा लगता था कि वो सुबह से काम पर लग जाती थी और दोपहर को ही फ़्री हो पाती थी। धीरे-धीरे मैंने भाभी के काम में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था। अब भाभी मुझसे बहुत खुश रहती थी। मैं उनके साथ प्याज, सब्जी आदि काट देता था। वाशिंग मशीन में कपड़े धो देता था, झाड़ू भी लगा देता था।
भाभी का काम करके मैं कॉलेज चला जाता था। मैं जवान हो चला था, कुछ सेक्स की बातों को मैं समझने भी लगा था। घर में मात्र भाभी ही थी जिसके शरीर के उभारों को देख कर मैं खुश रहता था। वो घर में अधिकतर पेटीकोट और एक तंग सा ब्लाऊज पहने रहती थी, जिसमें भाभी के सीने के उभार मुझे बहुत उत्तेजक लगते थे। भाभी भी काम करते करते थक जाती थी, फिर वो आराम करती थी। आज तो वो मेरे कमरे में आ गई थी और मुझसे कहने लगी- निर्मल, मेरी पीठ दबा दे, बहुत दर्द कर रही है। बहुत काम पड़ा है !
जल्दी क्या है भाभी? खाना तो दो बजे खाते हैं, थोड़ा आराम भी कर लिया करो !
अरे ये काम निपटे तो चैन आये ना ... चल दबा दे !
वो बिस्तर पर उल्टी लेट गई और अपनी आंखें बन्द कर ली। मैं धीरे धीरे कमर दबाने लगा। उसे बहुत आराम मिल रहा था। मैं भाभी के पैर भी दबाने लगा था। उसे जाने कब नींद लग गई और वो सो गई। मुझे उसके खर्राटे की आवाज आने लगी। तभी मेरे मन का शैतान जाग उठा। मुझे लगा कि मैं उसकी नींद का फ़ायदा उठा सकता हूँ। बड़ी सतर्कता से मैंने भाभी का पेटीकोट उठाया और अन्दर झांक कर देखा। भाभी के दोनों मस्त चूतड़ बड़े ही उत्तेजक लग रहे थे। भाभी के चूतड़ थोड़े भारी भी थे। मैंने एक बार भाभी को देखा और पेटीकोट के अन्दर हाथ घुसा दिया। बहुत ही धीरे से मैंने भाभी के पृष्ट उभारों को हाथ से छू कर जायजा लिया। मेरा मन हुआ कि उसे काट खाऊं। फिर सावधानी से मैंने पेटीकोट को नीचे कर दिया। मेरा लण्ड खड़ा हो गया था।
तभी भाभी ने करवट ली और सीधी हो गई। मैं जल्दी से दूर हो गया, पर वो अभी भी सो ही रही थी। मुझे फिर एक मौका और मिला और मैंने एक बार से भाभी का पेटीकोट ऊपर करके उसकी चूत के दर्शन कर लिये। छोटे छोटे बाल थे और दोनों लब उभरे हुये थे। मैंने सावधानी से भाभी की ओर देखा और झुक कर उसकी चूत को चूम लिया। चूत सूखी थी ... एक नारी शरीर की खुशबू सी आई। अभी तक तो सभी कुछ सही चल रहा था। मैंने भाभी के ब्लाऊज के बटन भी खोल दिये ... उनके दोनों स्तन पर्वत से उठे हुये मेरे सामने आ गये थे। भाभी के जाग जाने का खतरा था सो मैंने अब बस करना ही उचित समझा। पर अब ब्लाऊज के बटन कैसे लगाऊं, ब्लाऊज तो तंग था। ब्लाऊज के बटन बंद करने से तो वो जाग जाती। मैंने कमरे से निकल जाना ही बेहतर समझा।
मैं नहाने के लिये स्नानघर में घुस गया। मेरे खड़े लण्ड को मैंने मुठ मारा और अपना वीर्य निकाल दिया। नहा धो कर मैं बाहर आ गया। तब तब भाभी जाग गई थी और आश्चर्य से अपना खुला हुआ ब्लाऊज देख रही थी। उसने मुझे देखा तो झेंप गई और हुक बंद करने लगी। समय देखा तो दस बज चुके थे। मैं फिर कॉलेज चला गया था।
दूसरे दिन भी भाभी ने मुझे फिर से पीठ दबाने को कहा और उल्टी लेट गई। आज मैं भाभी की पीठ दबा कम रहा था बल्कि उसे सहला रहा था। बीच बीच में उसके चूतड़ों को भी छू लेता था। मैंने देखा कि भाभी आज भी सो गई थी। मेरा लण्ड फिर से खड़ा होने लगा था। मैंने हौले से भाभी के चूतड़ों को ऊपर से ही सहलाया। फिर उसके स्तनों को सहलाने लगा। अचानक भाभी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
यह क्या कर हो तुम... क्या कल भी तुमने मेरे साथ ऐसे किया था? भाभी ने मुझे एक थप्पड़ मार दिया।
मेरी सारी आशिकी धरी रह गई। मैं बुरी तरह से घबरा उठा था।
भाभी, सॉरी... माफ़ कर देना ... मैं बहक गया था...
भूल गये कि मैं तुम्हारी भाभी हूँ ...
मेरी निगाहें शरम से झुक गई। मैं धीरे से उठा और कमरे से निकल गया। मेरा मन ग्लानि से भर गया था। मैं उस घड़ी को कोस रहा था जब मैंने यह हरकत की थी। दो तीन दिन तक तो मेरी हिम्मत ही नहीं हुई रीता भाभी से आंख मिलाने की। फिर एक दिन मैंने धीरे से किचन में बर्तन धोते हुये भाभी से माफ़ी मांग ली।
भाभी ने मुझे मुस्करा कर कहा- किस बात की माफ़ी ... तुम उस दिन से नाराज हो गये थे, तो मुझे ही अच्छा नहीं लग रहा था, सच बताऊँ तो माफ़ी मुझे मांगनी चाहिये थी !
मेरा मन हल्का हो गया, और भाभी ने भी मुझे गालों पर चूम लिया था। काम समाप्त होते होते साढ़े नौ बज गये थे। भाभी मेरे कमरे में आई और धम्म से बिस्तर पर उल्टी लेट गई।
चल दबा दे मेरी पीठ ... शरमा मत ...
मैंने चुपचाप उसकी पीठ मसल दी। उसे थोड़ा अजीब सा लगा। वो उठ कर बैठ गई- अच्छा चल तू लेट जा, मैं तेरे पैर दबा देती हूँ...
अरे नहीं भाभी, बस ठीक है...
अरे चल ना ... लेट जा ...
भाभी के फिर से वही अपनापन देख कर मैं खुश हो गया। मैं बिस्तर पर सीधा लेट गया। भाभी मेरे पजामे के ऊपर से ही मेरे दोनों पांव दबाने लगी। धीरे-धीरे वो मेरी जांघो तक आ गई। मेरे शरीर में विचित्र सी गुदगुदी होने लगी।
मेरा लण्ड जाने कब खड़ा हो गया और पजामे में से उभर कर बाहर अपनी छवि दिखाने लगा। भाभी बड़े चाव से मेरे खड़े लण्ड को निहार रही थी। उसकी आंखों में गुलाबी डोरे तैरने लगे थे। उसके चेहरे पर वासना का भूत नजर आने लगा था। मेरी जांघे सहलाने और दबाने से मेरे शरीर में सिरहन सी होने लगी थी। लण्ड कड़क होने लगा था। बिना चड्डी के लण्ड पजामे के भीतर लहराने लगा था।
भाभी के हाथ की मुठ्ठियाँ बार बार लण्ड के पास भिंचने लगी थी, मानो वो लण्ड को पकड़ कर मसल देना चाहती हों।
भाभी के हाथ मेरी जांघों के ऊपर तक और लण्ड पास तक जोर जोर से दबा रहे थे।
नशे में मेरी आँखें बंद सी होने लगी थी। लण्ड में बहुत मिठास सी भरती जा रही थी। तभी शायद भाभी का मन बहक उठा और अपनी सारी मर्यादायें तोड़ कर उन्होंने मेरा लण्ड पकड़ लिया और जोर जोर से दबाने लगी।
मैं तड़प उठा... पर उसका हाथ मजबूती से लण्ड पर जमा था। मैंने उत्तेजना से भर कर करवट लेनी चाही पर उसने मेरा लण्ड नही छोड़ा। भाभी के मुख से सिसकारियाँ निकल रही थी। उसका दूसरा हाथ अपनी चूत को मल रहा था। भाभी मुठ भर कर ऊपर नीचे हाथ चला कर मेरे लण्ड को मसलने लगी।
भाभी, हाय रे ... बस करो ... आह्ह्ह्ह ! तभी लण्ड से मेरा वीर्य निकल पड़ा। मेरा पजामा ऊपर तक भीग गया और ढेर सारे माल ने मेरा लण्ड और नीचे की गोलियां तक गीली कर दी। मैंने उठ कर भाभी के स्तन दबा दिये, पर भाभी अपने आप को छुड़ा कर भाग गई। मुझे कुछ समझ में नहीं आया ... । मैं जल्दी से स्नानघर में जाकर नहा कर आ गया।
मैं भाभी के कमरे में गया तो उसने अपने आपको बाथरूम में बंद कर लिया।
तुम जाओ यहां से ...
पर बात तो सुनो ... !
नहीं... बस जाओ, मुझे बहुत लाज आ रही है !
मैं कॉलेज चला गया। मेरा मन भटक गया था। क्लास में भी मन नही लगा।
लंच पर डेढ़-दो बजे :
मम्मी स्कूल से आ चुकी थी, पापा भी आ गये थे। भाभी की बड़ी-बड़ी आंखे नीची झुकी हुई, सभी को भोजन परोस रही थी। भोजन के बाद भाभी के कमरे में गया तो मुझे देख कर उसने अपना चेहरा छुपा लिया।
कोई देख लेगा, तुम जाओ ना ...
मुझे इस शर्म का मतलब समझ में नहीं आया। दूसरे दिन मैं भाभी के साथ काम करता रहा पर वो अपना मुख मुझसे छिपाती रही। मैं बेचैन हो उठा। काम समाप्त होने पर मैंने भाभी को उसके कमरे में घेर ही लिया।
भाभी, प्लीज मुझसे बात करो ना !!
भैया, सॉरी ... गलती हो गई कल ...
कैसी बाते करती हो ... भाभी सच बताऊँ तो आप बहुत अच्छी हैं !
नीरू, पर मैंने तुम्हे तो मारा भी था ना ? !!
चलो बात बराबर हो गई, पहले मैंने गलती की थी, कल आपने फ़ाऊल किया था, बस ?
भाभी धीरे से आकर मेरे गले लग गई।
मेरा नाम आरती है। मेरी शादी बड़ौदा में एक साधारण परिवार में हुई थी। मैं स्वयं एक दुबली पतली, दूध जैसी गोरी, और शर्मीले स्वभाव की पुराने संस्कारों वाली लड़की हूँ। घर का काम काज ही मेरे लिये लिये सब कुछ है। पर काम से निपटने के बाद मुझे सजना संवरना अच्छा लगता है। रीति रिवाज के मुताबिक दूसरों के सामने मुझे घूंघट में रहना पड़ता है। काम से हम लोग स्वर्णकार हैं। मेरे ससुर और पति कुवैत में काम करते हैं। उनकी कमाई वहाँ पर अच्छी है। कुवैत से दोनों मिलकर काफ़ी पैसा हमें भेज देते हैं...उससे यहाँ पर हमने अपना मकान का विस्तार कर लिया है।
मेरे पति के एक मित्र साहिल पास के गांव के हैं वो हमारे घर अक्सर आ जाते हैं और चार पांच दिन यहाँ रह कर अपना काम करके वापस चले जाते हैं। वो भी स्वर्णकार हैं। घर में बस तीन सदस्य ही हैं, मैं, मेरी सास और और मेरी छोटी सी ननद जो मात्र १3 साल की थी। साहिल हमारा हीरो है... वो हमारे यहाँ पर क्या क्या करता था... और हम उसके साथ कैसे मजे करते थे...... आईये, मैं आपको आरम्भ से बताती हूँ...
मुझे इस घर में आये हुए लगभग चार माह बीत चुके थे...यानि मेरी शादी हुए चार माह ही बीते थे। आज साहिल भी गांव से आया हुआ था। मैने उसे पहली बार देखा था। मेरी ही उम्र का था। उसे मेरी सास कमला ने उसे एक कमरा दे रखा था वो वहीं रहता था। कमला ने मेरा परिचय उससे कराया। मैने घूंघट में से ही उन्हें अभिवादन किया।
उसके आते ही मुझे कमला ने पास ही सब्जी मण्डी से सब्जी लाने भेज दिया। मैं जल्दी से बाहर निकली और थोड़ी दूर जाने के बाद मुझे अचानक याद आया कि कपड़े भी प्रेस कराने थे...मैं वापस लौट आई। कमला और साहिल दोनों ही मुझे नजर नहीं आये... साहिल भी कमरे में नहीं था। मै सीधे कमला के कमरे की तरफ़ चली आई... मुझे वहां पर हंसने की आवाज आई... फिर एक सिसकारी की आवाज आई... मैं ठिठक गई।
अचानक हाय ... की आवाज कानों से टकराई... मैं तुरंत ही बाहर आ गई मुझे लगा कि मां अन्दर साहिल के कुछ ऐसा वैसा तो नहीं कर रही है।
मैंने बाहर बरामदे में आकर आवाज लगाई..."मां जी...! कपड़े कहां रखे हैं?"
कमला तुरन्त अपने कमरे में से निकल आई... साहिल कमरे में ही था। अपने अस्त व्यस्त कपड़े सम्हालती हुई बाहर आ कर कहने लगी,"ये बाहर ही तो रखे हैं..."
उनके स्तनों पर से ब्लाऊज की सलवटें बता रही थी कि अभी बोबे दबवा कर आ रही हैं...उनकी आंखें सारा भेद खोल रही थी। आंखो में वासना के गुलाबी डोरे अभी भी खिंचे हुए थे। मुझे सनसनी सी होने लगी... तो क्या कमला ... यानी मेरी सास और साहिल मजे करते हैं... ?
मैं भी घर में नई थी...मेरा पति भी बाहर था। मैं भी बहुत दिनों से नहीं चुदी थी। मेरा मन भी भारी हो उठा...मन में कसक सी उठने लगी...मां ही भली निकली... पति की दूरी साहिल पूरी कर देता है...और मैं...हाय... ।
मैं सब्जी लेकर और दूसरे काम निपटा कर वापस आ गई थी। सहिल और कमला दोनों ही खुश नजर आ रहे थे... क्या इन दोनों ने कुछ किया होगा। मेरे मन में एक हूक सी उठने लगी। मुझे साहिल अब अचानक ही सुन्दर लगने लगा था...सेक्सी लगने लगा था। मैं बार बार उसे नीची और तिरछी नजरों से उसे निहारने लगी। कमला भी उसके आने के बाद सजने संवरने लगी थी। ४० वर्ष की उम्र में भी आज वो २५ साल जैसी लग रही थी। मेरा मन बैचेन हो उठा...भावनायें उमड़ने लगी... मन भी मैला हो उठा।
दिन को सभी आराम कर रहे थे... तभी मुझे कमला की खनकती हंसी सुनाई दी। मैं बिस्तर से उठ बैठी। धीरे से कमरे के बाहर झांका फिर दबे कदमों से कमला के कमरे की तरफ़ बढ़ गई। दरवाजे खिड़कियां सभी बन्द थे... पर मुझे साईड वाली खिड़की के पट थोड़े से खुले दिखे। मैंने साईड वाली खिड़की से झांका तो मेरा दिल धक से रह गया। कमला ने सिर्फ़ पेटीकोट और ब्लाऊज पहना था... सहिल बनियान और सफ़ेद पजामा पहना था... कमला अपने पांव फ़ैला कर लेटी थी और साहिल पेटीकोट के ऊपर से ही अपना लण्ड पजामे में से कमला की चूत पर घिस रहा था.... कमला सिसकारी भर कर हंस रही थी...
मेरे दिल की धड़कन कानों तक सुनाई देने लगी थी। अब साहिल टांगों के बीच में आकर कमला पर लेटने वाला था... कमला का पेटिकोट ऊपर उठ गया ... पजामें में से साहिल का लण्ड बाहर आ गया और अब एक दूसरे को अपने में समाने की कोशिश करने लगे... अचानक दोनों के मुख से सिसकारी निकल पड़ी... शायद लण्ड चूत में घुस चुका था... बाहर से अब साहिल के चूतड़ो के अलावा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। मेरे पांव थरथराने लगे थे।
मै दबे पांव अपने कमरे में आ गई... मेरा चेहरा पसीने से नहा गया था। दिल की धड़कने अभी भी तेज थी। मैं बिस्तर पर लोट लगाने लगी। मैने अपने उरोज दोनों हाथो से दबा लिये... चूत पर हाथ रख कर दबाने लगी। फिर भाग कर मैं बाहर आई और एक लम्बा सा बैंगन उठा लाई। मैने अपना पेटिकोट उठाया और बैंगन से अपने आपको शांत करने का प्रयत्न करने लगी। कुछ ही देर में मैं झड़ गई।
रात हो चुकी थी। लगता था कि कमला और सहिल में रात का प्रोग्राम तय हो चुका है। दोनों ही हंस बोल रहे थे...बहू होने के कारण मुझे घूंघट में ही रहना था... मैं खाना परोस रही थी... सहिल की चोरी छुपे निगाहें मुझे घूरती हुई नजर आ जाती थी। मैं भी सब्जी, रोटी के बहाने उसके शरीर को छू रही थी... घूंघट में से मेरी बड़ी बड़ी आंखें उसकी आंखों से मिल जाती थी। मेरी हल्की मुस्कुराहट उसे आकर्षित कर रही थी... मेज़ के नीचे से कमला और साहिल के पांव आपस में टकरा रहे थे...और खेल कर रहे थे... ये देख कर मेरा मन भी भटकने लगा था कि काश...मेरी भी ऐसी किस्मत होती... कोई मुझे भी प्यार से चोद देता और प्यास बुझा देता...।
रात को सोने से पहले मैं पेशाब करने बाहर निकली तो साहिल बाहर ही बरामदे में खड़ा था। मैं अलसाई हुई सी सिर्फ़ पेटिकोट और बिना ब्रा की ब्लाऊज पहले निकल आई थी। साहिल की आंखे मुझे देखते ही चुंधिया गई... दूध सा गोरा रंग... छरहरी काया... ब्लाऊज का एक बटन खुला हुआ... गोरा स्तन अन्दर से झांकता हुआ... बिखरे बाल... वह देखता ही रह गया। उसे इस तरह से निहारते हुए देख कर मैं शरमा गई... और मेरी नजरें झुक गई..."सहिल जी ... क्या देख रहे हैं... आप मुझे ऐसे मत देखिये......" मैं अपने आप में ही सिमटने लगी।
"आप तो बला की खूबसूरत हैं... " उसके मुह से निकल पड़ा।
"हाय... मैं मर गई...! " मैं तेजी से मुड़ी और वापस कमरे में घुस गई... मेरी सांसे तेज हो उठी... मैंने अपनी चुन्नी उठाई और सीने पर डाल ली... और सर झुकाये साहिल के पास से निकलती हुई बाथ रूम में घुस गई। मैं पेशाब करना तो भूल ही गई...अपनी सांसों को...धड़कनो को सम्हालने में लग गई... मेरी छाती उठ बैठ रही थी... मै बिना पेशाब किये ही निकल आई। साहिल शायद मेरा ही बरामदे में खड़ा लौटने का इन्तज़ार कर रहा था। मैने उसे सर झुका कर तिरछी नजरों से देखा तो मुझे ही देख रहा था।
"सुनो आरती...!"
मेरे कदम रुक गये...जैसे मेरी सांस भी रुक गई... धड़कन थम सी गई...
"जी..."
"मुझे पानी पिलायेंगी क्या...?
"जी..." मेरे चेहरे पर पसीना छलक उठा... मै पीछे मुड़ी और रसोई के पास से लोटा भर लाई...मैने अपने कांपते हाथ साहिल की तरफ़ बढा दिये... उसने जानबूझ कर के मेरा हाथ छू लिया।
और मेरे कांपते हाथों से लोटा छूट गया... मैने अपनी बड़ी बड़ी आंखे ऊपर उठाई और साहिल की तरफ़ देखा...तो वो एक बार फिर मेरी आंखो में गुम सा हो गया... मैं भी एकटक उसे देखती रह गई...... मन में चोर था ... इसलिये साधारण व्यवहार भी कठिन लग रहा था। साहिल का हाथ अपने आप ही मेरी ओर बढ़ गया... और उसने मेरे हाथ थाम लिये... मैं साहिल में खोने लगी ... मेरे कांपते हाथों को उसने एकबारगी चूम लिया...
अचानक मेरी तन्द्रा टूटी... मैने अपना हाथ खींच लिया...हाय...कहते हुये कमरे में भाग गई और दरवाज़ा बन्द कर लिया। दरवाजे पर खड़ी आंखें बन्द करके अपने आपको संयत करने लगी...। जिन्दगी में ऐसा अहसास कभी नहीं हुआ था... मेरे पांव भी थरथराने लगे थे... मैं बिस्तर पर आकर लेट गई। नींद आंखों से कोसों दूर थी। देर तक जागती रही। समय देखा... रात के बारह बज रहे थे...
उस समय तो मैं पेशाब नहीं कर पाई थी सो मैने इस बार सावधानी से दरवाजा खोला और इधर उधर देखा... सब शान्त था... मैं बाहर आ कर बाथरूम चली गई। बाहर निकली तो मुझे कमला के कमरे की लाईट जली नजर आई...और मुझे लगा कि साहिल भी वहीं है... मैने दबे कदमों से उसी खिड़की के पास आई... अन्दर झांका तो साहिल पहली नजर में ही दिख गया। कमला साहिल की गोदी में दोनों पांव उठा कर लण्ड पर बैठी थी...शायद लण्ड चूत में घुसा हुआ था। दोनों मेरी ही बातें कर रहे थे...
"मां जी... कोई मौका निकाल दो ना... बस आरती को चोदने को मिल जाये...!"
"उह... ये थोड़ा सा बाहर निकालो... जड़ तक बैठा हुआ है... आरती तो बेचारी अब तक ठीक से चुदी भी नहीं है...!"
"कुछ तो करो ना..."
"अरे तू खुद ही कोशिश कर ले ना... जवान चूत है... पिघल ही जायेगी... फिर चुदने की उसे भी तो लगी होगी।... ऐसा करना कि मुझे सवेरे काम से जाना है दोपहर तक आऊंगी..."
"तो क्या ... !"
"अरे उसे दबोच लेना और चोद देना...फिर मैं तो हूँ ही...समझा दूंगी... हाय रे अन्दर बाहर तो कर ना...! चल बिस्तर पर आ जा...!"
कमला धीरे से उठी...साहिल का लम्बा सा लण्ड चूत से बाहर निकल आया... हाय रे इतना मोटा और लम्बा लण्ड.... मेरी चूत पनियाने लगी... उनके मुँह से मेरे बारे में बाते सुन कर एक बार फिर मेरी दिल की धड़कन बढ़ गई। दिल को तसल्ली मिली कि शायद कल मैं चुद जाऊं... सोचने लगी कि जब साहिल मेरे साथ जबरदस्ती करेगा तो मैं चुदवा लूंगी और अपनी प्यास बुझा लूंगी। पलंग की चरमराहट ने मेरा ध्यान भंग कर दिया। साहिल कमला पर चढ़ चुका था। उसका मोटा लण्ड उसकी चूत पर टिका था...
"चल अन्दर ठोक ना... लगा दे अब..." और फिर सिसक उठी। लण्ड चूत के भीतर प्रवेश कर चुका था। मेरी चूत में से पानी की दो बूंदे टपक पड़ी... मैने अपने पेटीकोट से अपनी चूत रगड़ कर साफ़ कर ली... मेरा मन पिघल उठा था... हाय रे कोई मुझे भी चोद दे... कोई भारी सा लण्ड से मेरी चूत चोद दे... मेरी प्यास बुझा दे...
अन्दर चुदाई जोरदार चालू हो चुकी थी। दोनों नंगी नंगी गालियो के साथ चुदाई कर रहे थे,"हाय कमला... आज तो तेरी भोसड़ी फाड़ डालूंगा... क्या चिकनी चूत है...!"
"पेल हरामी... ठोक दे अपना लण्ड...चोद दे साले..." दोनों की मस्त चुदाई चलती रही... एक हल्की चीख के साथ कमला झड़ने लगी... मेरी नजरें उनकी चुदाई पर ही टिकी थी... साहिल भी अब अपना वीर्य कमला की चूत पर छोड़ रहा था। मै दबे पांव अपने कमरे में लौट आई...। मेरी स्थिति अजीब हो रही थी। क्या सच में कल मैं चुद जाऊंगी...कैसा लगेगा... जम कर चुदवा लूंगी... सोचते सोचते मेरी आंख जाने कब लग गई और मैं सपनों में खो गई... ...सपने में भी साहिल मुझे चोद रहा था... मुझ पर वीर्य बरसा रहा था.... सब कुछ गीला गीला सा लगने लगा था...मेरी आंख खुल गई... मैं झड़ गई थी... मैने अपनी चूत पेटीकोट से ही पोंछ डाली। सवेरा हो चुका था...।
मै जल्दी से उठी...और अपना गीला पेटीकोट बदला...और सुस्ताती हुई दरवाजा खोल कर बाहर आ गई...
सवेरे मैं सुस्ती में उठी .... ....अलसाई सी बाहर बरामदे में आ गई और कसमसाते हुए दोनों हाथों को ऊपर उठाते हुए अपने बोबे को पूरा बाहर उभारते हुए अंगड़ाई ली.... कि पीछे से एक सिसकारी सुनाई दी....
"आरती जी....ऐसी अंगड़ाई से तो मेरे दिल के टांके टूट जायेंगे....! गुड मॉर्निंग ....!" साहिल मुसकराता हुआ बोला....
"हाय रे....आप यहां ....?" मैं शरमा गई....दोनों हाथों से अपनी चूंचियो को छिपाने लगी.....पर रात की बातें मुझे याद आ रही थी। अब मैं भी कुछ करना चाहती थी....साहिल का सामना करना चाहती थी ....शायद आज वो मेरे साथ जोर जबरदस्ती करे....पर इसके विपरीत मैं उसे रिझाना चाहती थी ....पर मुझमें इतना साहस नहीं था....पर साहिल बेशरम था....एक के बाद एक मुझ पर तीर मारता गया....मुझे काम भी बनता नजर आने लगा....मैं मन मजबूत करके वहीं खड़ी रही ....
"ज़रा हाथ नीचे करो ना ........ आपके वक्ष बहुत सुन्दर हैं .... और सुन्दरता दिखाई जाती है.... छुपाई नहीं जाती ....!" मेरी चूंचियो को निहारते हुए उसने कहा।
"हाय साहिल जी ....ऐसे ना कहो.... मुझे शरम लगती है ...." मैंने अपने सीने से हाथ हटा कर चेहरा छुपा लिया।
वो मेरे पास आ गया और मेरे चेहरे को ऊपर उठा दिया ....।
"इस खूबसूरत चेहरे पर पर्दा न करो....ये बड़ी बड़ी आंखें ....गोरा रंग....गुलाबी गाल....ये इकहरा बलखाता बदन .....गजब की सुन्दरता....खुदा ने सारी खूबियाँ आप में डाल दी हैं ...."
"हाय मैं मर जाऊँगी ...." मैं सिमटती हुई बोली। उसकी बातें मुझे शहद से ज्यादा मीठी और सुहानी लग रही थी। मैं इस बात से बेखबर थी कि कमला अपने कमरे के बाहर खड़ी सुन कर मुस्करा रही थी....।
"हाय ....कश्मीर की वादियाँ भी इतनी सुन्दर नहीं होंगी जितनी सुडौल ये पहाड़ियाँ है....ये तराशा हुआ बदन....ये कमर....कही कोई अप्सरा उतर आई हो जैसे ....." मैंने अपनी आखें बन्द किये ही अपने हाथ नीचे कर लिये....मेरे उभार अब उसके सामने थे। साहिल मेरे बहुत नज़दीक आ गया था....अब मुझसे सहन नहीं हो रहा था....मैं घबरा उठी।
"हाय राम जी ....!" मै कहती हुई मुड़ी और भागने के ज्यों ही कदम बढ़ाया मैं कमला से टकरा गई।
"हाय राम....मां जी....आप ....?"
"जरा सम्हल कर आरती....गिर जायेगी.....! सुन मैं ज़रा काम से बाज़ार जा रही हूँ .... साहिल को चाय नाश्ता और खाना खिला देना ....देखना कुछ कमी न हो ....एक बजे तक आ जाऊंगी ...." मुस्कुराती हुई आगे बढ़ गई।
साहिल ने फिर एक तीर छोड़ा,"भरी जवानी....जवान जिस्म....तड़पती अदायें....किसके लिये हैं ...."
मैंने देखा कमला जा चुकी थी। अब हम दोनों घर में अकेले थे ....और कमला ने जब साहिल को छूट दे दी थी तो मुझे भी उसका फ़ायदा उठा लेना था।"कहां से सीखा ....ये सब ...."
"जब से आप जैसी सुन्दरी देखी ....दिल की बात जबान पर आ गई ...." मैं अब चलती हुई अपने कमरे में आ गई ....साहिल भी अन्दर आ गया .... मैंने चुन्नी उठाई और सीने पर डालने ही वाली थी कि उसने चुन्नी खींच ली....इसे अभी दूर ही रहने दो....और दो कदम आगे बढ़ कर मेरा हाथ पकड़ लिया ....
"ये क्या कर रहे है आप.....छोड़ दीजिये ना ...." मैं सिमटने लगी....हाथ छुड़ाने की असफ़ल कोशिश करने लगी।
"आरती ....प्लीज.... आप बहुत अच्छी हैं ....बस एक बार मुझे किस करने दो ....फिर चला जाऊंगा ...." उसने अब मेरी कमर में हाथ डाल दिया। नीचे से उसका पजामा तम्बू बन चुका था....मेरी चूत भी गीली होने लगी थी। मैं बल खा गई और कसमसाने लगी....शर्म से मैं लाल हो उठी थी। मेरा बदन भी आग हो रहा था।
"साहिल....देख....ना कर ....मैं मर जाऊंगी ...." मैंने नखरे दिखाते हुए, बल खा कर उसके बदन से अपना बदन सहलाने लगी....और उसे धकेलने लगी
"आरती....देख तेरे सूखे हुए होंठ....तड़पता हुआ बदन....आजा मेरे पास आजा....तेरे जिस्म में तरावट आ जायेगी ....."
"साहिल....मैं पराई हूँ .....मैं शादीशुदा हूँ ....ये पाप है ...." उसे नखरे दिखाते हुए मैं शरम से दोहरी होने लगी ....
"आरती तेरे सारे पाप मेरे ऊपर....तुझे पराई से अपना ही तो बना रहा हूँ ...." उसने अपना लण्ड मेरे चूतड़ो पर गड़ा दिया ....
"साहिल सम्हालो अपने आप को .... दूर रखो अपने को ...." अब तो वस्तव में मुझे पसीना लगा था। मेरा बदन सिहर उठा था। कमला की रात वाली चुदाई मेरी आंखो के सामने घूमने लगती थी। मुझे लगा कि ये अपना लण्ड मेरी चूत में अब तो घुसेड़ ही देगा। मेरी चूतड़ो की दरार में उसका लण्ड फ़ंसता सा लगा। लण्ड का साईज़ तक मुझे महसूस होने लगी थी। मैंने घूम कर साहिल के चेहरे की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर मधुरता थी....मिठास थी ....मुस्कुराहट थी....लगता था कि वो मुझ पर किस कदर मर चुका था।
मैं शरम के मारे मरी जा रही थी। मुझे उसने प्यार से चूम लिया। मैंने उसकी बाहों में अपने आप को ढीला छोड़ दिया....चूतड़ो को भी ढीला कर दिया। उसने मेरे पेटीकोट का नाड़ा खींच लिया ....मेरे साथ उसका पजामा भी नीचे आ गिरा....उसने मेरा ब्लाऊज धीरे से खोल कर उतार दिया....मेरी छोटी छोटी पर कड़ी चूंचिया कठोर हो गई....उसने मेरे दोनों कबूतर पकड़ लिये....हम दोनों अब पूरे नंगे थे।
मैं उसकी बाहों में कसमसा उठी। मै सामने बिस्तर पर हाथ रख कर दोहरी होती गई और सिमटती गई....पर झुकने से मेरी गांड खुल गई और उसका लण्ड मेरी दरारो में समाता चला गया....यहां तक कि अन्दर के फूल को भी गुदगुदा दिया। मुझे एकाएक फूल पर ठंडा सा लगा ....साहिल ने अपने थूक को मेरे गाण्ड के फ़ूल पर भर दिया था। लगा कि चिकना सुपाड़ा फ़ूल के अन्दर घुस चुका था। मेरे मुख से आह निकल गई....मेरी दुबली पतली काया ....गोरी गोरी सुन्दर सी गोल गोल गाण्ड....मेरी प्यासी जवानी अब चुदने वाली थी।
"हाय रे आरती....कितनी चिकनी है रे.....ये गया ....।" लण्ड मेरी गाण्ड के अन्दर सरकता चला गया....मेरे दिल में चैन आ गया ....चुदाई के साथ सथ ही मेरे शरीर में चुदाई की झुरझुरी भी आने लगी थी कि आखिर चुदाई शुरू हो ही गई। उसके हाथ मेरी पीठ को सहलाते हुये बोबे तक पहुंच गये थे....और अब ....हाय रे ....उसने मेरी छाती मसल डाली ....मैं शरम से सिकुड़ सी गई..... मैं धीरे धीरे बिस्तर पर पसर गई....मैंने अब हिम्मत करके शरम छोड़ दी।
अब मैंने मेरी दोनों टांगे खोल दी ....पूरी चौड़ा दी....उसे मेरी गाण्ड मारने में पूरी सहूलियत दे दी....अब मेरे चूतड़ो को मसलता ....थपथपाता....नोचता ....खींचता हुआ गाण्ड चोद रहा था....मुझे मस्ती चढती जा रही थी। अपनी मुठ्ठियो में तकिये को भींच रही थी। दांतो से अपने होंठो को काट रही थी....और पलंग़ धक्को के साथ हिल रहा था। अब वो मेरे पर लेट गया था....उसका पूरा भार मेरी पीठ पर था....और कमर हिला हिला कर धक्के मार रहा था। मेरी गाण्ड चुदी जा रही थी। मेरे मुख से बार बार आहें निकल पड़ती थी।
"मेरी जानू....अब बस....अब तेरी चूत की बारी है ...." और अपना लण्ड गाण्ड से धीरे से निकाला और चूत का निशाना साध लिया। मुझे एकाएक अपनी चूत पर चिकने सुपाड़े की गुदगुदी हुई और मेरी चूत ने लण्ड के स्वागत में अपने दोनों पट खोल दिये....और लण्ड अकड़ता हुआ तीर की तरह अन्दर बढ चला।
"मां रीऽऽऽऽ आऽऽऽह ....चल ....घुस जा ....राम जी रे ...." मेरा मन और आत्मा तक को शांति मिलने लगी....लण्ड चूत की गहराई तक घुसता चला गया .....और जड़ तक को छू लिया। दर्द उठने लगा....पर मजा बहुत आ रहा था। चूत को फ़ाड़ता हुआ दूसरे धक्के ने मेरे मुख से जबरदस्त चीख निकाल दी....मेरी चूत से खून बह निकला ....
"हाय....साहिल देख बहुत दर्द हो रहा है....धीरे कर ना ...."
"हाय रे मेरी बच्ची को मार देगा क्या ...." कमला की पीछे से आवाज आई....मैं घबरा उठी ....ये कहाँ से आ गई ....
"नहीं वो धक्का जोर से लग गया गया था ....बस ....।"
"आरती ....मेरी बच्ची....मैं हूँ यहाँ .... आराम से चुदवा ले ...." कमला ने हम दोनों को ठीक से लेटाया और तौलिए से खून साफ़ किया और मेरी चूत पर क्रीम लगाई ....
"अरे ....गाण्ड भी मार दी क्या ...." मेरे पांव उपर करके गान्ड में भी चिकनाई लगा दी।
"अब ठीक है .....चलो शुरु हो जाओ ...." अब साहिल मेरे दोनों पांवो के बीच में आ गया और लण्ड को चूत में उतार दिया ....चिकनी चूत में लण्ड मानो फ़िसलता हुआ....आराम से पूरा बैठ गया। मुझे बड़ा सुकून मिला। अब चुदाई बहुत प्यारी लग रही थी।
कमला भी अब मेरे बोबे सहला रही थी। रह रह कर वो साहिल की गाण्ड भी सहला देती थी थी और अपना थूक लगा कर अंगुलि को उसकी गाण्ड में डाल देती थी। इस प्रक्रिया से साहिल बहुत उत्तेजित हो जाता था। अब कमला ने साहिल की गाण्ड को अंगुली से चोदना चालू कर दिया था। उसके धक्के भी बढ़ गये थे ....। मेरी चुदाई मन माफ़िक हो रही थी मेरा जिस्म बिजली से भर उठा था....बदन कसावट में आ चुका था। सारी दुनिया मुझे चूत में सिमटती नजर आ रही थी। लगा कि सारी तेजी ....सारी बिजलियाँ ........सारा खून मेरी चूत के रास्ते बाहर आ जायेगा ....और ........और .... ....
"मां री ऽऽऽऽऽ ....हाऽऽऽऽय रे ....मर गई .... ...."
"बस ....बस....बेटी....हो गया....निकाल दे....झड़ जा ...." कमला प्यार से मेरे उरोजो को सहलाते हुए झड़ने में मदद करने लगी....
"मम्मी....मैं गई ....ईईऽऽऽऽऽऽऽ....आईईईइऽऽऽऽ....मेरे राम जी ...." और मैं जोर से झड़ गई....
"अरे धीरे चोद ना ....देख वो झड़ रही है ...." उसकी चुदाई धीमी हो गई ....ऐसे में झड़ना बहुत सुहाना लग रहा था....पर साहिल जोर लगाने की कोशिश कर रहा था। कमला ने उसकी कमर थाम रखी थी कही वो झटका ना मार दे। मैंने साहिल का लण्ड बाहर निकाल दिया और करवट ले कर लेट गई। कमला ने उसका लण्ड हाथ में भरा और जोर से रगड़ कर मुठ मारा और
"ओ मां की चुदी ....मैं मर गया....हाय निकाल दिया रे भोसड़ी की ...." और पिचकारी छोड़ दी....
"देख इस मां के लौड़े को....पिचकारी देख ...." मैंने अपना मुख दोनों हाथो से छुपा लिया। वो झड़ता रहा....और एक तरफ़ बैठ गया।
मैंने जल्दी से पेटीकोट उठाया ....। पर कमला ने छीन लिया ....
"अभी और चुद ले ....अपने पिया तो परदेस में है ....सैंया से ठुकवा ले ....अभी उनके आने में बहुत महीने हैं ...."
"मांऽऽऽ....तुम बहुत ....बहुत....बहुत अच्छी हो" ....प्यार से मैं मां के गले लग गई।
मन में आया कि पिया भले ही परदेस में हो....हम माँ बेटी तो साहिल के जिस्म से अपनी चूत की आग तो शांत ही कर सकती है ना ....
साहिल एक बार और मेरे पर चढ़ गया.....मैंने भी अपने पांव चौड़ा दिये....उसका कठोर लण्ड एक बार फिर से मेरी नरम नरम चूत को चोदने लग गया। लगा मेरी महीनों की प्यास बुझा देगा ।
"बेटी मैं तो जवानी से ही ऐसे काम चला रही हूँ....खाड़ी के देश गये हैं ....इस खड्डे को तो फिर पड़ोसी ही चोदेंगे ना ...."
"मां अब चुप हो जा....चुदने दे ना ...." मुझे उनका बोलना अच्छा नहीं लग रहा था ....। रफ़्तार तेज हो उठी थी.... सिसकियों से कमरा गूंज उठा
प्रेषक : रमेश गुप्ता
मेरी कथा "बीवी और साली के साथ सुहागरात" का दूसरा भाग आप लोगों के लिए हाजिर है।
सुहागरात को पहले साली सोनू को चोदने के बाद अब मेरी बीवी मीना की नथ उतरने जा रही है :
लन्ड को मुँह में ले लो, थोड़ी देर में मूंगफ़ली से तोप बन जाएगा मेरी जान ! मैं बोला।
छी: यह कोई मुँह में लेने की चीज है? घिन नहीं आएगी क्या? मीना बोली।
इससे पहले मैं कुछ कहता, सोनू बोली- इसको मुँह में लेने का तो अपना अलग ही मजा है मेरी बहन ! अगर तुझे नहीं लेना तो मत ले, पर मैं यह मौका नहीं छोड़ने वाली ! तू तो अपनी बुर में ही ले लेना, चुसाई मैं कर लेती हूँ !
तेरी मर्जी, मैं तो यह नहीं करुँगी ! मुझे तो इसमें घिन आ रही है ! इस पर मीना बोली।
फ़िर मैंने अपनी पत्नी को पकड़ लिया और उसके होठों का चुम्बन लेने लगा। वो पहले ही इतनी गर्म हो चुकी थी कि ज्यादा कुछ करने की जरुरत नहीं पड़ी और वह भी मुझे जोर जोर से चूमने लगी और मुझे कस कर पकड़ लिया। काफ़ी देर तक मैं उसके होठों को चूसता रहा, उसे भी अब इस सब में पूरा मजा आने लगा था।
मैंने फ़िर से उसकी ब्रा उतार दी... वाऊउउउ... उसकी चूचियाँ देख कर मैं तो चकित ही रह गया। छोटे छोटे सन्तरे के आकार की चूचियाँ और उसकी निप्पलों को नज़र ना लगे बिल्कुल मटर के दाने से भी छोटे। मैंने दस बारह मिनटों तक चूचियों को खूब दबाया।
उधर सोनू मेरा लंड मुँह में ले कर धड़ाधड़ चूसे जा रही थी। मेरा लन्ड एक बार फ़िर से एकदम खड़ा और कड़क हो कर बुर को दहाड़ मार मार कर बुलाने लगा था। मैं फिर भी उसकी चूचियाँ दबाने लगा था, जब मुझसे नहीं रहा गया तो मैंने उसकी साड़ी खोलनी शुरु कर दी। साड़ी खोल कर मैंने उसकी पैन्टी खींच ली और थोड़ी देर उसे देखने लगा। वाह चिकनी बुर थी, मैं उसकी बुर पर हाथ फ़ेरने लगा परन्तु इस बार मैंने अपनी ऊँगली उसकी बुर में नहीं डाली क्योंकि मुझे डर था कि कहीं वह फ़िर से ना बिदक जाए, इसलिए मैं सिर्फ़ उसकी बुर को ऊपर से ही मसलता रहा।
उसके मुँह से अब .. आआहहह... ऊउउम्म्म्म म्म्मम... आईईईईईई -सीईईईसीई..... आआआ.... की आवाजें निकल रही थी।
उधर सोनू ने मेरे लन्ड को चूस-चूस कर बेदम कर रखा था, मीना की बुर का भी बुरा हाल हो गया था, उसकी बुर का मक्खन बह कर उसके चूतडों तक पहुँच चुका था। अब मुझे लग रहा था कि बुर पूरी तरह से लन्ड लेने के लिए बेकरार है। परन्तु बुर एकदम नई थी इसलिए मैंने सोचा कि इसे थोड़ा और तड़फ़ाया जाए ताकि पहली बार लन्ड लेने में इसकी गर्मी इसके दर्द के एहसास को कम कर दे।
मैं अब उसके चूचियाँ को पीने लगा, चूचियों को पीने मेरी पत्नी की हालत और खराब हो गई, सोनू भी अब मेरा लन्ड पीना छोड़ वहीं पर बैठ गई और हमारा खेल देखने लगी।
मैं अब उसकी चूचियों को और कस कर चूसने में लग गया। उसने भी मेरा लन्ड पकड़ कर सहलाना चालू कर दिया और मेरी बीवी अब काफ़ी हद तक गर्म हो चुकी थी, वह चुदवाने को बेक़रार थी।
उसने मुझसे कहा- अब करते क्यों नहीं, जल्दी करो, अब नहीं रहा जा रहा ! मेरी बुर में दर्द होने लगा है, डाल दो अब इसमें !
पर मैं उसकी चूचियों को चूसने में ही लगा हुआ था। तभी उसने मेरा लंड पकड़ा और अपनी बुर की तरफ़ ले जाने की कोशिश करने लगी।
मैं समझ गया कि अब तड़पाना अच्छा नहीं है। मैंने पलट कर उसकी दोनों टाँगों को फ़ैला दिया उसके ऊपर चढ़ गया। मैं धीरे-धीरे अपना लंड उसकी बुर में डालने की कोशिश करने लगा, परन्तु उसकी बुर का छेद इतना छोटा था कि मेरा सात इंच का लन्ड बार बार फ़िसल कर नीचे चला जा रहा था। अत: मैंने अपने दोनों हाथ उसके पैरों के नीचे से ले जाकर उसके दोनों पाँव ऊपर उठा लिए, जिससे उसकी बुर ऊपर की ओर उठ गई तथा लन्ड उसकी बुर के बिल्कुल सामने आ गया।
फ़िर मैंने ताकत लगा कर एक जोर का धक्का लगाया और लन्ड उसकी बुर फ़ाडता हुआ लगभग दो इंच लंड उसकी बुर में घुस गया। उसका मुँह खुल गया और आँख से पानी आ गया, वह जोर से चिल्लाई- आईईईईई - माँम्म्म्म्म्म्माआआ...घुस्स्स्स गया आआआ... मेरी बुर फ़...फ़...ट्ट्ट्ट्ट गई ! मरर गई !
वह इतनी जोर से चिल्लाई थी कि मुझे लगा शायद उसकी आवाज को पूरे घर ने सुना होगा, वह इतने जोर से चिल्लाएगी इसका मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था, वरना मैं पहले ही उसके मुँह पर हाथ रख लेता।
मैंने कुछ देर ऐसे ही पड़े रहने में अपनी भलाई समझी।
तुमने तो मार ही डालने का इरादा कर रखा है क्या? आराम आराम से नहीं कर सकते क्या ? या यह कोई रबड़ का खिलौना है कि जैसे मर्जी वैसे तोड़ मरोड़ दिया? वो लगभग रोते हुए बोली।
पर मैं बोला- मेरी इसमें क्या गलती है, तुम्हारी बुर है ही इतनी छोटी सी ! मैंने तो अभी अपना सुपारा ही तुम्हारी बुर के अन्दर डाला है, इसमें ही तुम्हारा यह हाल है तो पूरा लन्ड तुम्हारी बुर में जाएगा तो तुम्हारा क्या हाल होगा? और पहली पहली बार है तो थोड़ा दर्द तो होगा ही ना, अभी थोड़ी देर में कहोगी कि जोर जोर से मारो, धीरे धीरे में मजा नहीं आ रहा !
थोड़ा दर्द होता तो मैं सह लेती, पर तुमने तो मेरी जान ही निकाल दी, थोड़ा धीरे चोदो, बुर भी तुम्हारी है और मैं भी तुम्हारी ही हूँ, एक रात में ही सारी जान निकाल दोगे तो बाकी दो चार रातों तक चुदवाने के लायक भी नहीं रहूँगी, फ़िर अपना लन्ड पकड़ कर बैठे रहना ! वो बोली।
परन्तु मैं जानता था कि यह उसकी प्रथम चुदाई है ऐसा तो होना ही था, अभी थोड़ी देर बाद यह खुद ही जोर लगाने लगेगी और चूतड़ उछाल उछाल कर चुदवाएगी।
मैंने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरु किए... आआहहह... ऊउम्म्मम म्म्मम... आईईईईईईई - माँम्म्म्म्म्म्माआआ ... ... उसके मुँह से दर्द भरी परन्तु उत्तेजनापूर्ण आवाजें निकलने लगी। लगभग पाँच मिनट बाद जब मेरा पूरा लन्ड उसकी बुर में हिचकोले खाने लगा तो वह भी चूतड़ उछाल उछाल कर अपनी बुर में मेरा लण्ड लेने लगी।
अब वह मेरे लण्ड को सुपारे से ले कर टट्टों तक उछल-उछल कर चुदवा रही थी। उधर मेरी साली की हालत दोबारा खराब हो गई थी वह एक हाथ से अपने हाथ से अपनी बुर को मींजे जा रही थी तथा दूसरे हाथ से अपनी चूचियों को दबाये जा रही थी तथा मुँह से उत्तेजनापूर्ण अजीब अजीब आवाजें आआहहह... ऊऊउउउम्म्म म्म्मम... आईईईईई -सीईईईसीई..... आआ... निकाले जा रही थी। उसे देख कर लग रहा था कि वह अभी मेरी बीवी को हटा कर खुद चुदवाने की इच्छा रखती हो।
इधर मैं मीना की बुर का बैन्ड बजाने में लगा हुआ था, बुर टाईट थी, लण्ड भी अटक अटक के जा रहा था, मैं अब अपनी पूरी ताकत लगा कर उसकी बुर में डाल रहा था, हर धक्के पर उसकी मुँह से हल्की हल्की चीख निकल रही थी- आईईईईईई -सीईईईसीई..... आआआ.... करीब दस पन्द्रह मिनट की चुदाई के बाद उसकी बुर अब पूरे मजे से मेरे लन्ड लील रही थी और वो- चोद डालो, फ़ाड डालो, आज पूरी तरह से फ़ाड दो मेरी बुर को, और जोर जोर से मारो, पूरा डाल दो मेरे राजा !
अचानक उसने मुझे अपनी पूरी ताकत से मुझे दबाना शुरु कर दिया, मैं समझ गया कि अब इसकी बुर ने पानी छोड़ देना है, मैंने भी अपने धक्कों की रफ़्तार पूरी बढ़ा दी। दो मिनट बाद उसकी पकड़ ढीली पड़ गई, उसकी बुर ने अपना पानी छोड़ दिया था।
करीब दस मिनट के बाद मेरा भी लन्ड झड़ने को हो गया। मैंने अपने धक्कों की रफ़्तार में और तेजी कर दी, आठ-दस धक्कों के बाद लन्ड की पिचकारी छुट पड़ी और सारा का सारा माल उसकी बुर में भरता चला गया। मैंने अपने हाथ उसकी टाँगों के नीचे से निकाले और उसके ऊपर ही लेट गया। मेरी और उसकी साँसे बड़ी तेजी से चल रही थी।
फ़िर वह उठी और बाथरुम में जा कर अपनी बुर को साफ़ करने लगी। पाँच मिनट बाद वो बाहर निकली तो उसके चाल में थोड़ा लचकपन था पर चेहरे पर सन्तुष्टि के भाव थे।
बाप रे, मेरी बुर तो सूज कर गोलगप्पा बन गई है ! मीना बोली।
उस रात मैंने मीना और सोनू को दो बार और चोदा, मैंने उनकी गान्ड मारने की भी असफ़ल कोशिश कई बार की परन्तु आज मेरी शादी को पन्द्रह साल हो गए, परन्तु ना तो सोनू ने, ना ही मीना ने आज तक मुझे अपनी गान्ड पर हाथ रखने दिया। मैं भी इसी आशा में लगातार कोशिश करने में लगा हुआ हूँ कि कभी तो इन दोनों में से कोई मेरी बात मानेगी।
उसके बाद मैंने अपनी बाकी तीन सालियों की चुदाई कैसे की, उसके बारे में मैं बाद में बताऊँगा…
आप को मेरी कथा कैसी लगी, मुझे ई-मेल कर जरुर बताइएगा।